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Manju Mahima

Others

5.0  

Manju Mahima

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-हथेलियों में सूरज-

-हथेलियों में सूरज-

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जी चाहता है उगा लूँ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

जो जला सके

उन लोलुप वासना-रत

निगाहों को,

जो ताकती रहती है,

अबोध अहिल्याओं को.

जी चाहता है उगा लूँ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

कर सके जो भस्म ,

उन बलात्कारियों को,

जो छिपे हैं आज भी,

सबकी निगाहों से,

और गरज रहे हैं,

शेर बन कर.

जी चाहता है उगा लूँ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

जिसकी किरणें समा जाएँ,

कलम में मेरी,

उधेड़ दे जो बखिए,

सिले हुए राज़ो के,

हो जाएँ जिनसे रोशन,

उनके अँधेरे के गुनाह,

जो पाएं हैं पनाह सत्ता की,

कर भस्म उनके आशियानों को,

कर दूं उन्हें,

भटकने को मज़बूर .

जी चाहता है उगा लूँ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

कर दूँ भस्म उन,

तथाकथित नेताओं को,

जो नेता कम पिछलग्गू

अधिक आते हैं नज़र,

जो छिपाएं हैं सफेदी में,

अपने कर्मों की कालिख,

और ढा रहे हैं कहर.

नोटों के नशे में धुत्त,

जिनकी कलम तुलती है,

करोड़ों में.

जिनके कालीन के तले,

बिछे होते हैं,

अरबों-खरबों रुपए,

भविष्य को कर सुरक्षित,

सो रहे हैं जो बेखबर.

जी चाहता है उगा लूँ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

कर दूँ भस्म,

उन देशद्रोहियों को,

जो देश में आज भी,

घूम रहे हैं ज़िंदा,

कर रहे आतंकित,

जनता को पहन मुखौटा.

जी चाहता है उगा लूँ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

जो बनकर आए

एक आशा की किरण

उन हृदयों में

जो आज बुझ चुके हैं,

खो बैठे हैं अपनी आस्था

सत्ता के प्रति

जो लाए एक स्वर्णिम प्रभात,

उन चंद इंसानों के लिए,

जो आज भी सत्य के साए में

ईमानदारी और विश्वास को लपेटे

गठरी बने बैठे हैं,

अपने घरौंदे में.

जी चाहता है उगा लूँ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

नहीं खौफ़ तनिक मुझे

अपनी हथेलियाँ जलने का,

राहत ही मिलेगी तब,

कर सकूंगी जब कुछ तो,

दिशाहीन,

भटकते समाज को

रोशनी से रु-बरू करवाकर





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