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Dayasagar Dharua

Drama

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Dayasagar Dharua

Drama

बलिदान

बलिदान

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वो पहला दिन था

पाँचवी कक्षा के बाद दस साल की उम्र में

एक प्रवेशिका परीक्षा के उपरान्त

सौ में से हम बारह बच्चों का

दाखिला हो गया

गुरूकुल वैदिक विद्यापीठ में

जंगल के बीचो बीच ठहरा आश्रम में


माँ पापा, चाचा चाची, भाई बहन

सभी के अभिभावक उस दीन आये हुए थे

स्कूटरों में, फटफटियों में, जीपों में

अपने बच्चों को

सौ रुपये का, दो सौ रुपये का नोट थमा रहे थे 

रोते रोते उनके बालों को सँवार रहे थे


मैं और मेरे बाबा साइकल पे थे

उनसे दूर एक पेड़ के नीचे हम खड़े थे

तभी बाबा ने बीस रुपये का नोट मुझे थमाया

रोना नहीं, ठीक से पढ़ना

झगड़ा नहीं करना कह कर मुझे समझाया


मुझे पता था के बाबा के पास और पैसे नहीं थे

हप्ते भर के गराज की कमाई मुझ पे लुटा चुके थे

बाबा इतना बलिदान कैसे कर लेते हैं मैं तब जाना

वो साइकल पे गाडीयों के पीछे थे

लेकिन उन गाड़ी वालों से अमीर लग रहे थे


कुछ घंटों बाद हम बारह एक साथ हो गये

पर साथ होकर भी अकेले थे

कुछ ने रोना शुरु कर दिया

कुछ ने दर्द को दिल में ही दबोच लिया

जोरों की मायूसी सबके चेहरों से झलक रहे थे

पर मैंने न रोया

क्यों की बाबा की वो बातें मुझे सम्हाल रहे थे


अब आँखों में एक तराजू सी झूल रही थी

जो उस पल को पुराने पलों से तौल रही थी

सहपाठीयों को दोस्तों से

गुरुओं को माँओं से

गुरूकुल को गाँव से हरा रही थी

पर बाबा का वो बलिदान

हर बार उनको जीता रही था।


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