STORYMIRROR

Dayasagar Dharua

Abstract

4  

Dayasagar Dharua

Abstract

काबिल

काबिल

1 min
352

देखा करता था सपनें पहले रातों मे

अटल था कामयाब होने की चाहत मे

हौसलें थे मुश्किलें जूझने की जिगर मे

अब निंदे कहतीं सपनों के लायक मैं नहीं

शायद कभी था काबिल जिंदगी में


उडने की आश लिये दौडा था मैदानों में

छलांगों पे गिरता था मैदानी घासों के गोद में

उडने भी लगा था गुजरती हवा की टोली में

निचे से मैदान ने कहा के उडने लायक मैं नहीं

शायद कभी था काबिल जिंदगी में


था पुराना कोइ जमाना हँसी देता था होठों में

बाँटा करता था ख़ुशीयाँ हर एक मायूसी में

और शामिल हो जाता था उन्हीं मुस्कानों में

पर हँसी ने कहा अब हसाने लायक मैं नहीं

शायद कभी था काबिल जिंदगी में


हर मुश्किल से भी मुश्किल हालातों में

खुद टूट कर धीरज बाँधा करता था दूसरों में

पर न जाना था कि वे गिनते मुझे हैं परायों में

उन्होंने कहा के अपना कहने लायक मैं नहीं

शायद कभी था काबिल जिंदगी में


हो जिंदगी से नाराज़ था चला अकेले पन में

ताकि सून सकुँ धड़कने अपनी इसी राह में

जब सुना तब धड़क रही थी किसी उल्झन में

तभी धड़कनें भी साफ कहीं के जिने लायक मैं नहीं

शायद कभी था काबिल जिंदगी में।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract