बिखरा दो तुम केश !
बिखरा दो तुम केश !
बिखरा दो तुम केश अगुम्फित,
उनसे मैं जा खेलूंगी।
मंद पवन हौले से आकर,
गोरी से यह कहती है।।
अपना तो सदियों से तुमसे,
नेह - छेंह का नाता है।
चुम्बक सा है तेरा चेहरा,
अपने को यह भाता है।।
दूधिया चांदनी हौले - हौले,
आँगन में आ छिटकी है।
चन्दा विह्वल-विस्मित देखो,
वह आवाज़ लगाता है। ।
पता चला सूरज को दिन में,
दौड़ाया उसने घोड़ा।
बेबस गोरी चिंतित बोली,
झुलस ना जाए मुख मेरा।।
निष्ठुर सूरज रुका नहीं,
बरसाता जाता अब गोला।
तेरे लिये यह आँचल मेरा,
विस्मित हो तरुवर यह बोला।।
पवन, परम प्रिय मित्र है मेरा,
आकर डालेगा वह घेरा।
गोरी विस्मित , पवन आ गया,
नख - शिख पर सौन्दर्य छा गया।।
नारी और प्रकृति का अद्भुत,
मानो, स्वर्ण - सुहाग मिल गया।
उठा पवन अब उच्च गगन में,
बादल से जाकर बोला।।
दुखी है प्रियतम मेरे साथी,
ले चल अपना हिंडोला ।
बादल तत्पर हुआ तीव्रगति,
आसमान में जा गरजा।।
छिप गया सूरज दूर कहीं जा,
टप-टप बूँदें लगी हैं गिरने।
कुहू कुहू कोकिल स्वर झरना,
मन अब लगा कुलांचें भरने।।
