भूखा अन्नदाता
भूखा अन्नदाता
आज सुनाता हूं एक मार्मिक कथा को
अन्नदाता की व्यथा को
सबका पेट भरने वाला , खुद भूखा सो गया
कृषि प्रधान देश मे किसान लाचार हो गया
धरती का सीना फाड़ने में निकल जाती जवानी है
हर पल काम करना पड़ता भीषण गर्मी हो या आसमान से बरसे पानी है
भूमिसुत कहलाने वाला अम्बर को प्यारा हो जाता है
खेती के देश मे किसान बेसहारा हो जाता है
आत्महत्या करते कर्ज़ के बोझ में दबकर
हर पल जीते है हर पल मरकर
कागज़ों में आश्वासन होता , कागज़ों में कायदे
अन्नदाता का पता नही , कागज़ों में ही होते फायदे
धरती में ही दफन हो जाते इनके सपने
पैसों के लालच में छोड़ देते इनके अपने
चुनावो में ही होते किसानों के बारे में चर्चे
जारी नही हो पाते इनके लिए बाबाओ के पर्चे
देख दशा किसानों की भारत माता के आंसू बहते हैं
भारत माता के देश मे उनके बेटे घुट घुट कर रहते हैं
देखते है नीची नज़रो से किसानी के काम को
कोई नही पूछता पेट भरने वाले किसान को
क्यो नही मानव में मानवता जाग रही
भूखा है अन्नदाता क्यो भूख नही भाग रही
ईश्वर भी क्यो नही इनपर दया कर रहे
बजाकर चुटकी क्यो नही इनका भी पेट भर रहे।
