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Madhu Vashishta

Romance Inspirational

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Madhu Vashishta

Romance Inspirational

भीगता मन

भीगता मन

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आषाढ़ में भीगता मन दर्पण।

धरती सा तपता था तन और मन।

इंतजार थी सावन की,

खिलने को तत्पर था पीड़ित मन।

मेघ मल्हार भी जल्दी में थे।

बरसने को आतुर वह भी थे।

टप टप बरसते शरीर से पसीने को

धूप की गहन किरणों के साथ देखते वह भी थे।

देख विरहिणी की तपिश मेघ भी

बेचैन हुआ।

सावन से पहले ही वर्षा का संकेत हुआ।

आषाढ़ में ही बरसी रिमझिम रिमझिम बूंदें।

सैनिक साजन की छुट्टी मिलने का संदेश हुआ।

सावन के आने से पहले ही,

आषाढ़ में ही मन दर्पण भीग गया।

चारों और हरियाली छाई।

खुशियां सावन से पहले ही आई।

बस थोड़ा सा रुक जाना मेघ मल्हार।

आ जाए मेरे साजन इस पार।

फिर झड़ी तुम ऐसी लगा देना।

खिल जाए फूल चले सुगंधित बयार।

साजन ना जाने पाएं फिर जल्दी उस पार।



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