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Kusum Joshi

Abstract

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Kusum Joshi

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भीड़ का हिस्सा

भीड़ का हिस्सा

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भीड़ का हिस्सा हूँ मैं भी,

भीड़ में ही वो खड़ा,

मैं सूट बूट में तन रहा,

वो बिन कपड़ों के ही पड़ा,


भोजन तो चाहा मैंने भी,

उसको भी भोजन चाहिए,

मैं चाहता व्यंजन कोई,

वो पानी से पेट भर रहा,


जाड़े की कड़कती रात में,

मैं हीटर मिला तब सो सका,

जाड़ा तो उसको भी लगा,

पर वो ठिठुरता रह गया,


अंतर नहीं शरीर में था,

मुझको वो अपना सा लगा,

पर जो मुझे यूं मिल गया,

उसको वो सपना सा लगा,


ज़रूरतें हमारी एक थी,

पर एक ना थी ख़्वाहिशें,

मैं चाहता बंगला बड़ा सा,

वो भोजन को भी तरस रहा,


मैं भी माँगता हूँ दान,

वो भी दान लेने आ रहा,

पंक्ति में मैं भी हूँ,

वो भी पंक्ति में ही है खड़ा।।


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