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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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तेरे ख्याल सी

तेरे ख्याल सी

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शाम तेरे ख़याल सी

गुजर रही है

मन की दीवारों पर

टँगी हुयी तुम्हारी

तस्वीर अपना रंग बदल रही है


कभी कभी लगता है

दीवार से उतर कर

मेरे कमरे में चहलकदमी कर रही है

मैं तो देख रहा हूँ

तुम्हें दीवाल से उतरकर

कमरे में टहलते हुये


और कोई यकीन करें

न करे कि

तुम मेरे कमरे में हो

तुम्हारा होना

मेरे लिये एक यकीन है


और मैं जानता हूँ

आधुनिकता 

कुछ नये मैटर के साथ

संवर रही है

और कुछ सुलग रहा है


जो भी हो

मनुष्यता आधुनिकतम औजार है

बदलाव का

का और कुछ बदल रहा है।


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