भारतवर्ष के संस्कार।
भारतवर्ष के संस्कार।
यह हमारा भारत वर्ष है जो उच्चतम है संस्कारों में।
गुरु माता-पिता सदा रहे हैं पूजनीय यहां ।
चंद्रमा हमारा मामा, सूर्य पिता जल पवन सब का है ऊंचा स्थान यहां।
वृक्षों की भी पूजा करते हैं गाय है माता सम।
नारी भी देवी का रूप है फिर क्यों हुए हैं संस्कार कम?
क्यों माता-पिता को बच्चों वृद्ध आश्रम की राह दिखाते हैं?
ऐसा क्यों है बच्चे अपने माता-पिता से ही कतराते हैं।
शायद 200 साल की गुलामी ने कुछ ऐसा मन पर प्रभाव है डाला।
आधुनिकता की विकास यात्रा जो आगे बड़ी तो संस्कारों को ही रौंद डाला।
कंक्रीट के जंगल उग आए तो देव वृक्षों का रहा स्थान कहां?
नदियां भी मैली हो गई है,
सागर के तटों पर भी स्थान कहां?
शायद जब हम गुलाम बने तो विदेशियों ने किया हमारी मानसिकता पर ही कुठाराघात।
उनकी नकली चकाचौंध में घिर गया युवा वर्ग,
अपने ही संस्कारों का किया त्याग।
छप्पन भोग वाले देश में मीठे के लिए करते हैं चॉकलेट की बात।
प्रत्येक प्रदेश की अपनी संस्कृति, सुंदर संस्कार और सुंदर परिधान।
सुंदर संस्कारों को भूलकर क्यों कर रहे हैं बच्चे अपने माता-पिता का अपमान?
कुछ तो कमी कहीं तो होगी?
संस्कारों की डोर कहीं ढीली हमने भी छोड़ी तो होगी।
अंग्रेजी भाषा की चकाचौंध में हम भी उलझे तो होंगे।
तभी तो भारतवर्ष में गुरुकुल ना आगे बढ़ पाए होंगे।
अपने बच्चों की संस्कार विहीनता हमें भी आधुनिकता लगती तो होगी। भौतिकतावाद को बढावा देने की ललक तो हमारी भी होगी।
ध्यान से देखो मनन करो तो पता चलेगा की सारी गलती केवल बच्चों की ही ना होगी।
कुछ हमने भी किया तो होगा।
लेकिन परिणाम भुगतना तो सभी को होगा।
बयार चली जब आधुनिकता की
तो संस्कारों को तो उड़ना ही होगा।
आओ मिलकर हम संकल्प करें।
जो बचा सके सो बचाएंगे।
भले ही कविताओं कहानियों के माध्यम से
हम सबको पुरातन संस्कारों की याद कराएंगे।
जैसे-जैसे साथ बढ़ेगा
हमारी माला का आकार बढ़ेगा,
कुछ तो सफल होंगे हम
हो सकता है बच्चों का भी अपने माता-पिता के प्रति व्यवहार बदलेगा।
