STORYMIRROR

Vivek Netan

Tragedy

4  

Vivek Netan

Tragedy

बेटी का बाप हूँ बहुत डरता हूँ

बेटी का बाप हूँ बहुत डरता हूँ

1 min
399

जब भी सुनता हूँ पढ़ता हूँ में खबर बलात्कार की 

अंदर ही अंदर में बड़े जोर से सुलगता हूँ 

दिल तो करता है सरे आम जला दूँ ऐसे लोगों को 

क्या करूँ बेटी का बाप हूँ बहुत डरता हूँ। 


उंगली नहीं उसका हाथ पकड़ कर रखता हूँ 

मन्नत के धागे उसके हाथों में डाल के रखता हूँ 

लोग कहते है लड़की को लड़के की तरह रखता है 

क्या करूँ बेटी का बाप हूँ बहुत डरता हूँ। 


लोग तो कह देते है की आजाद रहने दो बच्चो को 

मगर में हमेशां उसे अपने साए में रखता हूँ 

तुम्हरा क्या कहते रहो दकियानूसी मुझको 

क्या करूँ बेटी का बाप हूँ बहुत डरता हूँ। 


अँधेरे की बात दूर, में दिन में भी चौंक जाता हूँ 

हर नजर को देख कर में शक से भर जाता हूँ 

मैं भी चाहता हूँ उड़े वो मस्त तितली की तरह 

क्या करूँ बेटी का बाप हूँ बहुत डरता हूँ।


जब कहती है वो पापा अब में छोटी नहीं रही 

उसकी इस ख़ुशी की देखकर भी घबरा जाता हूँ 

कब तक अपनी नजर की चादर में छुपा रखूंगा 

क्या करूँ बेटी का बाप हूँ बहुत डरता हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy