दोस्ती
दोस्ती
दोस्ती
के आ गया है मुकाम अब ऐसा,
कि कोई ख्वाहिश ना बची...
रिश्ते सारे ज़माने के कमाए हमने,
बस एक दोस्ती ना बची... |
कि किताबों की मंदिर से... घर के आंगन तक,
गुलशन था जहाँ हमारा जिन परिंदों से,
कि किताबों की मंदिर से... घर के आंगन तक,
गुलशन था जहाँ हमारा जिन परिंदों से...
उड़ गए सारे अब अपनी मंजिल पर...
उड़ गए सारे अब अपनी मंजिल पर...
पाँवों और पैरों की धूल के सिवाय... अब कोई निशानी ना बची,
पाँवों और पैरों की धूल के सिवाय... अब कोई निशानी ना बची...
रिश्ते सारे ज़माने के कमाए हमने,
बस एक दोस्ती ना बची...
कि जवानी में कदम रखते ही बन गए थे जो जी जान..
कहते थे जिन्हें... हमारी आन- बान-शान...
होती थी जिन दोस्तों से दिन रात बातें,
ढलता था दिन जिन संग... कटती थी रातें...
देखते हैं उन्हें महफिल किसी और के संग सजे हुए,
तो टूटी हुई दिल की कोई फरियाद ना बची...
हो गए वो ... कि बातों की अब दरख्वास्त ना बची...
रिश्ते सारे ज़माने के कमाए हमने,
बस एक दोस्ती ना बची...
ज़माने के साथ... हम भी चल पड़े,
मसलें... किस्से... कहानियाँ... कामयाबी... नाकामी... सबको साथ लेकर...
सफर में अब कई मुसाफिर मिलते हैं आज भी...
जिनसे पुरानी यादें दोहराते हैं...
कभी वो हँसाते हैं... कभी हम रुलाते हैं...
सबको हमसफ़र ही बुलाते हैं अब...
कि दोस्ती अब हमारे लिए कहाँ ज़माने में बची...
कि दोस्ती अब हमारे लिए कहाँ ज़माने में बची...
रिश्ते सारे ज़माने के कमाए हमने,
बस एक दोस्ती ना बची...
फिल्मों में... गानों में... लोगों की ज़ुबानियों में...
फिल्मों में... गानों में... लोगों की ज़ुबानियों में...
सुनते हैं दोस्ती की अहमियत और शोहरत.. .
सुनते हैं दोस्ती की अहमियत और शोहरत..
सुना है इतिहास गवाह है... दोस्ती के रिश्ते ने तो हराई हैं नापाक सी मोहब्बत...
सुना है इतिहास गवाह है... दोस्ती के रिश्ते ने तो हराई हैं नापाक सी मोहब्बत...
तन्हाई को अब इसी जुमले में छुपाना है...
तन्हाई को अब इसी जुमले में छुपाना है...
तोफ़ा भी क्या सुनहरा दे रखा है यारों ने...
कि ज़िंदगी को बस उनकी तस्वीर और यादों के सहारे गुजारना है...
कि ज़िंदगी को बस उनकी तस्वीर और यादों के सहारे गुजारना है...|
