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Kamal Purohit

Abstract

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Kamal Purohit

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

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इस ज़ीस्त के पलों को जलाने में रह गया

वो सिर्फ रुपये पैसे कमाने में रह गया


मुश्किल के दौर में न कोई देता साथ है

दौर ए ख़ुशी में इसको भुलाने में रह गया


वैरी बने हज़ार पता भी न चल सका

मैं दोस्त ज़माने में बनाने में रह गया


हर फैसले पे तेरे हमें तो गुमान था

क्यों झूठ को ही सच तू बताने में रह गया


लब से न कुछ कहा न सुना कान से कभी

नज़रों से तीर बस वो चलाने में रह गया


सागर भरा हुआ है मेरी आँख में कमल

हर बात पर मैं इसको बहाने में रह गया।


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