पलायन की पीड़ा (बूढ़ी माँ की चिट्ठी,अपने बच्चों के नाम)
पलायन की पीड़ा (बूढ़ी माँ की चिट्ठी,अपने बच्चों के नाम)
मेरे प्यारे बच्चों,
कैसा है तुम्हारा शहर ?
चकाचौंध के उजालों में,
क्या होता है वहां सबर?
या फिर वहाँ भी अँधेरों का राज है,
जैसे यहाँ सूनापन है
मेरी लाचारी की तरह।
मेरे प्यारे बच्चों
तुम्हारे जाने के बाद यहां
सब थम सा गया है,
वो आंगन का पौधा भी
तुम बिन अब सूखने लगा है।
तेरी हथेलियों की छाँव भी अब यहां
वीरानी में लिपटी है,
और दीवारों पे तेरी यादें दस्तक दिए
सिसकती है,
कोने कोने में गूंजती हैं फरियादें,
आंखों में झरते हैं निरंतर झरने।
तेरे पिता अक्सर तुझे आवाज़ देते हैं,
खेतों की पगडंडियों पर
तेरी यादों को
सीने में लिए घूमते हैं,
मिट्टी पर तेरी निशानियां ढूंढते हैं।
वो मंजर वो तेरे होने का अहसास
अब भी जँवा है,
और ये बंजर पड़े खेत
आकाश को तकते रूहांसे पड़े हैं।
गाँव का पनघट भी
अब चुप हो गया है,
बचपन की किलकारियाँ कहीं
गुमसुम वहीं बिखरी पड़ी हैं।
चौपाल के बूढ़े पीपल ने
झुककर मुझसे पूछा,
"तेरे बेटे फिर लौटेंगे या
ये घर बेघर रहेगा?"
निशब्द मैं बस टकटकी लगाए सुनती रही,
अंदर ही अंदर तेरे गम में घुटती रही।
तू वहाँ खुश तो है ना, बेटा?
या सपनों के शहर भी छलावा सा है?
यहाँ अब भी मिट्टी का चूल्हा जलता है,
पर रोटियों में मेरे हाथों का स्वाद
तुझ बिन अधूरा सा है।
लौट आ बेटा,
ये मिट्टी की खुशबू तुझे बुलाती है,
मैं अब भी चौखट पर
तेरी उम्मीद लगाए बैठी हूं,
तुझे लौटता देखने को
ये बूढ़ी आँखें तरसती हैं,
हर आहट पर चौंक उठें,
तेरी राह तकती हूं।
ये सांस कब उखड़ जाए,
बस तुझसे मिलने तक ठहरी हैं,
तेरी यादों की डोरी में,
जिंदगी की सांस अभी भी बंधी है।
तेरी माँ......
