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Vihaan Srivastava

Romance Others

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Vihaan Srivastava

Romance Others

बेगुनाह मोहब्बत

बेगुनाह मोहब्बत

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मासूम सी, भोली, नाजुक, होती है दिल की हसरत

समता और सौम्यता, भर देती जिसमें कुदरत

जल्दबाजी,लापरवाही, की जिसमे मिले आदत

बेगुनाह व गुस्ताख सी, होती है ये मोहब्बत।


राहों के कंकर पत्थर, चुभते निकलते जाते

अरमानों की कतारों, में सब फिसलते जाते

भीनी सी एक कशिश भी, दिल में दबी है रहती

हुजूम से भी झटपट, हम है गुजरते जाते।


तनहाई जितनी बढ़ती, बढ़ जाती है ये चाहत

बेगुनाह व गुस्ताख सी, होती है ये मोहब्बत।।


दिल में गिटार बजते, होती है जब जब बारिश

मन में अजीब लगती, इजहार की हर सिफारिश

हुस्न व अदाओं का भी, हर समा फीका लगता

उनके ख़्याल बिन अब, दिखता है सब लावारिस।


भगवान की जगह अब, उनकी हुई इबादत

बेगुनाह व गुस्ताख सी, होती है ये मोहब्बत।।


आहट कोई है होती, लगता वो निकट है

दूरी के सारे लम्हे, लगते क्यों अब विकट है

वो ही नायाब लगते, उनका ही ध्यान करते

हर गीत में वही है, उनकी ही अब तो रट है।


उनके ख्यालों से अब, मिलती नहीं है फुरसत

बेगुनाह व गुस्ताख सी, होती है ये मोहब्बत।।


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