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Utkarsh Srivastava

Abstract Tragedy Inspirational

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Utkarsh Srivastava

Abstract Tragedy Inspirational

बहती गंगा

बहती गंगा

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जिनको न एहसान चाहिए, जिनको नहीं जरुरत है 

अक्सर वो ही बतला देते, इंसान की क्या सूरत है 

तन में भगवा वस्त्र ओढ़कर, राम नाम का जाप करें  

अभी भी जो संशय में रहते, क्या पत्थर क्या मूरत है !!


मेहनत को जो नहीं मानते, न किसी का  हुनर सहें 

उनमे सिर्फ घमंड है मिलता , झूठी गफलत में न रहें 

जितने भी भोले,उलझे है उनको है पैगाम यहीं 

जब तक वो खुद जांच न ले, अफवाओं में नहीं बहे !!


आखों में लाखो सपने ले, आधे घर से दूर हुए 

क्योंकि निकट करीबी से ही, उनके पने चूर हुए 

सूरज को भी नतमस्तक, हो जाते हों सब जान के भी

घर के दीप बुझाने में, क्यों इतना मजबूर हुए !!  


मन में सिर्फ उँजाले ही है छिड़ी हुई कोई जंग नहीं 

मैंने सांप नहीं पाले है, मेरे काले रंग नहीं 

दोष खुद ही छुपा रहें  है, बदनामी करने वाले

चुगलखोर ही कहलाएंगे , जब तक हैं  संलग्न नहीं !!












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