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Utkarsh Srivastava

Abstract Inspirational

4  

Utkarsh Srivastava

Abstract Inspirational

मैं हूँ कर्जदार

मैं हूँ कर्जदार

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न देशभक्त, न देशद्रोही, न नेता, न सरकार,

उनका न सम्मान किया,जो हैं देश के पहरेदार?

हवा, पानी, मिट्टी, पेड़ों की न ही सुनी पुकार?

न कोई अभियान में मैं ,न कोई संघ सुधार?

देश का मैं हूँ मूल निवासी, देश का हूँ कर्जदार।

अन्न दिया जिन किसानों ने, उनको दी न छाया

तेज़ धूप में पुलिसकर्मी को, समझा रोज पराया

बच्चे तो भगवान स्वरूप, सबने है बतलाया,

उन अनाथ बच्चों से, मैंने पीछा खूब छुड़ाया

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, न कोई सरदार,

देश का मैं हूँ मूल निवासी, देश का कर्जदार।

संविधान से पुरुष चुस्त और सशक्त हुई है नारी,

इनकी न अवहेलना हो, यह नैतिक जिम्मेदारी।

न कोई सहयोग मेरा, न ही कोई तैयारी,

सिर्फ फायदा उठा रहा, जो जनहित में है जारी।

इतना भी नहीं सुनिश्चित, न चीख हो न पुकार,

देश का मैं एक मूल निवासी, देश का हूँ कर्जदार।

आज़ादी की छेड़ लड़ाई, खुद की दी कुर्बानी,

मेरा कोई सहयोग नहीं, कि उनकी रहे निशानी?

विदेशी चीजों का जैसे, चढ़ बैठा हो पानी,

बहिष्कार तो होता ही नहीं, होती है नादानी।

भारत को शहीद से जानो, हों उनकी  जय-जयकार,

देश का मैं एक मूल निवासी, देश का कर्जदार। 


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