STORYMIRROR

Suchismita Behera

Abstract

3  

Suchismita Behera

Abstract

चांद और चांदनी

चांद और चांदनी

1 min
12.1K

चंदा मामा तेरी कथा सुनी थी

गित तेरी मैने भी गाई थी

आज न जाने कविता रचने का

मन में अंदरुनी ख्वाहिश जग उठी।


देखी तेरी वह एक परछाई

हर वह पुनम रात खूब भाई

सवेरा हुआ तो फिर छुप गई

ढुंढने पर भी ना मिल पाई।


चांद कहूंं या चांदनी सही

फ़िक्र बस तुझे खोने की रही

सुंदर गगन का तु उज्जवल प्रतीक

कम पड़ेगा तुझे ये मरी तारीफ।


दूर है तू पर असंभव नहीं

अंधेरी रात की किरण तू ही

आधी-आधी बंंट के पूरी बनती

कभी चांद फिर कभी चांदनी कहलाती।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract