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Dr Priyank Prakhar

Abstract

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Dr Priyank Prakhar

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बदलते रिश्ते

बदलते रिश्ते

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बहरूपियापन हावी है उन पर कुछ इस कदर,

उनके किरदार भी उन्हें खुद से ज्यादा सच्चे लगते हैं।

फिर जब देखता हूं मैं जिंदगी अपनी,

तो अपने ही एहसास मुझे बहुत कच्चे लगते हैं।


वादे कर रहे थे जो वो नजदीक आकर,

अब बातें कम, ज्यादा फसाने लगते हैं।

कसमें खाते थे जिन रिश्तो की अब तक,

उनके जिक्र भी अब बेमाने लगते हैं।


कल तक दौर ए जिक्र था जिनका,

अब वह सब गुजरे जमाने लगते हैं।

शुक्रिया कुछ यूं है उनको भी ऐ जिंदगी,

के अब तो बेगाने भी दिल में समाने लगते हैं।


क़रीबी भी नहीं नसीब थी जिनको हमसे कल तक,

अब वो भी हमारे पैमाने बनते हैं।

बेसब्र मत हो ऐ गाफिल इस बदलते दौर से,

क्योंकि ये तो बस एक दौर है,

हर एक दौर में नये भी फिर पुराने बनते हैं।


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