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महेश जैन 'ज्योति'

Tragedy

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महेश जैन 'ज्योति'

Tragedy

बदलाव

बदलाव

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वो लाये थे तूफान से किश्ती निकाल कर।

हम रख नहीं पाये हैं उसी को सँभाल कर।।

मत मुस्कुराइये इसे खतरे में डालकर।

हम रख नहीं पाये हैं उसी को‌ सँभाल कर।।


चुन-चुन के उजाड़ा है बाग फूल तोड़ के,

आई न लाज फेंकते कलियाँ मरोड़ के,

मुसका रहे हैं शूल बचे डाल-डाल पर।

हम रख नहीं पाये हैं उसी को सँभाल कर।।१


केशर की क्यारियों में गूँजती हैं गोलियाँ, 

पाँचों नदी के गाँव सिसकती हैं डोलियाँ,

बिंदिया की जगह खून झलझलाया भाल पर।

हम रख नहीं पाये हैं उसी को सँभाल कर।।२


उठते नहीं हैं नयन भी अब अपने गर्व से,

अब ऊब गये लोग देश भक्ति पर्व से,

आती नहीं है शर्म भी दोरंगी चाल पर।

हम रख नहीं पाये हैं उसी को सँभाल कर।।३


फाँसी का हँस के चूमा था जिसके लिये फंदा,

उसको ही हमने लूट लिया बन के दरिंदा,

अस्मत को लूट बैठ गये कफन डाल कर।

हम रख नहीं पाये हैं उसी को सँभाल कर।।४


अपनों के हाथ लुट रही है फिर से भारती,

दिखता नहीं है दर्द पीर से कराहती,

हाथों से मारती है तमाचे से गाल पर।

हम रख नहीं पाये हैं उसी को सँभाल कर।।


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