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Ravi PRAJAPATI

Romance

4  

Ravi PRAJAPATI

Romance

बचपन का प्यार

बचपन का प्यार

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छीन लिया यारों ने,तस्वीर हमारी। 

लूट लिया गांव ने,तकदीर हमारी।

कैसे पूछे कोई, तशरीफ़ हमारी।

जब ठहरी नहीं, गांव में जागीर हमारी।

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नज़र लगी किसकी,जो छूटी यारी। 

पता चला कैसे,जो रुठी प्यारी। 

वक्त न बदला, बदली क्यो यारी।

टूट गयी पल में, उम्मीद हमारी।

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बचपन था वो ,या भूल हमारी।   

कैसे माने वो थी,स्थूल कटारी। 

मान लिया नाजुक थी, फूलों की डारी।

पर मुनासिब न थी, उम्मीद हमारी। 

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बस रास्ते अलग हुए, मंजिल न हमारी।

वो भी तो थी हमें, प्राणों से प्यारी।

प्यासे न थे जो बुझे,प्यास हमारी।

उम्मीद है हमें न बुझे,आस हमारी 

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आज भी अधरो की हर, मुस्कान हमारी।

जल रही है आज भी,चाहत की चिंगारी।

पर चाह नहीं हम भी बने, सपनों के अधिकारी।

उसी के सपनों में बसी, जागीर हमारी।

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मन को बहला लेगी, तस्वीर तुम्हारी।

नींदों में बसा लेगी,हर नींद तुम्हारी।

मेरे हर सांस की, करती पहरेदारी

जब तक चाहे वो, चला ले सांस हमारी।

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छीन लूंगा उससे,हर दुःख की क्यारी‌।

बात नहीं कहूंगा मैं, मुख से भारी।

क्योंकि सपनों में बसी है, जागीर हमारी।

हर सांस चलती है, इजाजत से तुम्हारी।


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