बात बिना सोचकर
बात बिना सोचकर
जहां बात की जाती है, सोच समझकर
वो भला कब होता है, यहां अपना घर
जहां बात की जाती है, स्वार्थ रखकर
वहां नही होता है, अपना मित्र सुधाकर
जहां होता है, झूठ, फरेब दरिया भर
वहां कभी नही आती है, रोशनी नजर
वहां होता है, साखी बस किराये का घर
जहां बात की जाती है, सोच संभलकर
जहां बात की जाती है, बेफिक्र होकर
सच मे वो जगह होती है, स्वर्ग से सुंदर
वही रिश्ते होते है, यहां खून से बढ़कर
जो मुसीबत में साथ देते है, जी भरकर
बाकी तो दुनिया मे दिखावे की डगर
कहते कुछ, करते कुछ है, यहां पर नर
जहां बात की जाती है, सोच समझकर
वहां तो बस साखी दुनियादारी, रहबर
वहां पर कभी नही होता है, कोई डर
जहां मिल जाते है, एक जैसे दो शजर
वहां पर बात की जाती है, मन भर कर
जहां समान होती है, विचारों की नजर
वहां करती है, सच्ची मित्रता गुजर-बसर
जहां नही होता है, दुनियादारी का गदर
वहां होती है, बात बिन सोच समझकर
जहां रहता नही कोई दुनियादारी, मच्छर
वहां फ़लक के हो जाते है, सूक्ष्म शिखर
जहां नही होती है, दुनियादारी रत्तीभर
जहां होता नही है, साखी स्वार्थ कणभर
वहां बात की जाती है, दिल खोलकर
वहां यह हृदय रो देता है, बिना सोचकर
जहां बात होती है, सच्चा मित्र देखकर
जहां खत्म होता है, दुनियादारी सफर
वहां शुरू होता है, सच्चे मित्र का सफर
वो जानते है, सच मे बातचीत का हुनर
जो नही रखते है, झूठजाल अपने भीतर
बाकी तो बहुत है, यहां पानी दरिया भर
पर प्यास बुझाता है, सिर्फ नदिया जल।
