STORYMIRROR

Vishu Tiwari

Abstract Tragedy Others

4  

Vishu Tiwari

Abstract Tragedy Others

बाल -श्रम और बचपन

बाल -श्रम और बचपन

1 min
255

क्या बचपन है समझ न पाया, बर्तन मांज रहा है।

एक कलंक सा जीवन लगता, ऐसा सोच रहा है।।


खेल -खिलौने वाले दिन में, मैं मजबूर हुआ हूॅं।

कन्धों पर लेकर जिम्मेदारी, मैं मजदूर बना हूॅं।।


आंखों में है ख्वाब नहीं अब, सपने टूट रहे हैं।

शोषण में है फंसा ये बचपन, सारे लूट रहे हैं।।


नैसर्गिक अधिकार छिने, शिक्षा भी दूर हुई है।

श्रम की बेड़ी में जकड़ा, सुविधाएं दूर हुई हैं।।


कलम नदारद है हाथों में, पकड़ा देख हथौड़े।

सड़क किनारे बैठा बचपन, पत्थर देखो तोड़े।।


कचरे की थैली में उलझा, बचपन बिखरा जाए।

सड़कों पर बेहाल घूमता, दीन हीन दिख जाए।।


भूखा बचपन हुआ विवश , भिक्षा मांग रहा है।

बदहाली में नौनिहाल का, बचपन डूब रहा है।।


बचपन अगर बचाना है तो, शिक्षित इनको कीजै।

बालश्रमिक-उन्मूलन हित, मिल प्रयास सब कीजै।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract