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Prashant Kumar Jha

Tragedy

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Prashant Kumar Jha

Tragedy

औरत हूं कठपुतली नहीं

औरत हूं कठपुतली नहीं

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औरत हूं मैं, 

कोई कठपुतली नहीं, 

मर्दों के इशारों पर चलूं, 

ऐसा मैं चाहती नहीं, 

बचपन से आज तक मेरे, 

सपने तोड़े हैं सबने, 

बंधन के जंजीरों में बांधकर, 

सबने हक जताया सिर्फ औरत कहकर l


मर्यादा में आखिर मैं ही क्यों रहूं, 

मायका ससुराल का कहना मैं ही क्यों करूं, 

आत्मसम्मान चाहती हूं मैं भी, 

स्वावलंबी बन सकती हूं मैं भी, 

औरत हूं श्राप तो नहीं हूं, 

दुख-तकलीफ किससे जाकर कहूं, 

कष्ट मुझे मिले किस कारण, 

पति मुझेपे क्यों करता है उत्पीड़न? 


इतिहास गवाह है मेरा अस्तित्व का, 

सवाल उठता रहा मेरा पवित्रता का, 

जवाब दूं भी तो कैसे दूं, 

मौन रहकर क्या मै सबकुछ सहूं, 

दूर-दूर तक कोई ना है मेरा, 

इस समाज ने तो सीता को भी ना छोड़ा, 

औरत हूं मैं, 

कोई कठपुतली नहीं l



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