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Pankaj Prabhat

Drama Inspirational Thriller

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Pankaj Prabhat

Drama Inspirational Thriller

अपने अंदर के बाज़ को

अपने अंदर के बाज़ को

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लोगों की सोच के साये में, ज़िन्दगी चाक किये बैठा हूँ,

अपनी तबियत की आग को, यूँही खाक किये बैठा हूँ।

हर कदम दुनिया के चश्मे से, देखकर उठाया है,अब तक,

अपने अंदर के बाज़ को, एक डाली का काग किये बैठा हूँ।

अपने अंदर के बाज़ को, एक डाली का काग किये बैठा हूँ….


जन्मा तो था, मैं भी कृष्ण मगर, धृतराष्ट्र सा हूँ जी रहा,

संजय ढूँढने की चाह में, खुद ही पर, शंसय हूँ कर रहा।

भीष्म तो कई मिले मगर, कोई विधुर, कभी नही मिला,

अपने अंदर के व्यास को, दुर्योधन का अज्ञान किये बैठा हूँ।

अपने अंदर के बाज़ को, एक डाली का काग किये बैठा हूँ….


पहचान पाने की प्यास थी, पर उपहास से डरता रहा,

सही-गलत के बीच में, बस मरता हुआ ही जीता रहा।

न कभी खुद का विश्वास देखा, न प्रयास की सीमा जानी,

अपने अंदर के अर्जुन को, कर्ण का अभिमान किया बैठा हूँ।

अपने अंदर के बाज़ को, एक डाली का काग किये बैठा हूँ…..


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