' अंतर कल और आज का '
' अंतर कल और आज का '
पकड़ ज़िंदगी के कुछ यादगार लम्हों को
बाँध कर रखा है मैने अपनी मुठ्ठी को
खोल दूँगीं तो वो फिसल जायेंगें
फिर वो लम्हें मेरे हाथ कहाँ आयेगें
बचपन के वो गजब के प्यारे दिन थे
सपनों से वो बेहद न्यारे पलछिन थे
हर बात पर अपनी ही ज़िद करती थी
अम्माँ की मैं ज़रा भी नही सुनती थी
सब कहते थे जब कितना सांवरा रंग है मेरा
फिर मेरा दिमाग चलता था होते ही सबेरा
सब नहा - धो अच्छे कपड़े पहन तैयार होते
मैं इतराती अपने चेहरे पर ओडोमॉस पोते
जोर - जोर से सब मुझ पर खूब चिल्लाते
ये मच्छर भगाने की क्रीम है सब मुझे बताते
मुझे लगता इसकी खुशबू तो इतनी अच्छी है
फिर क्यों गुस्सा होते हैं सब जैसे ये मच्छी है
इसको लगाने से मैं कितनी गोरी हो जाती हूँ
किसी को फिर मैं नही सांवरी नज़र आती हूँ
काश आज की तरह फेयर एण्ड लवली होती
चेहरे पर लगाते ही मैं तो पूरी गोरी हो जाती
ना सब डाँटते ना मुझपे अपना ज्ञान बघारते
सबके सामने मेरी गोरी चमड़ी को सराहते
अच्छा हुआ बचपन में सबको ये कमी लगी
इसको दूर करने में मुझे अपनी प्रतिभा दिखी
बड़ी हुई तो रंग की बजाय हुनर से निखर गई
अपनी कामयाबी से मैं अंदर तक संवर गई
अंतर कल और आज से ये तो व्यक्त हो गया
जो मुद्दा इतना विशाल था आज ध्वस्त हो गया।
