अनोखा रिश्ता
अनोखा रिश्ता
बंद कर लू आँखें तो
सामने आता है तुम्हारा ही चेहरा
एहसास लू क़रीब होने का
खिल जाता है मेरा चेहरा
मुम्किन नहीं बताना
छुपाना भी मुश्क़िल राज़ चेहरों का
कश्मकश का शतरंज़
बन जाता है दिल एक मोहरा
आ जाऊँ आमने-सामने तो
आँखें देती हैं तुम पे ही पहरा
आँखों के रास्ते उतरकर
दिल में समा जाते हो गहरा
रुकती नहीं धड़कनें
चलती ही रहती हैं पहन के
साज़ तुम्हारे नाम का
बंध जाता हैं अनोखा रिश्ता
न कोई ऱस्मों-रिवाज़
ना डोली ना सेहरा।

