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पौरूष परिहार

Drama

3.8  

पौरूष परिहार

Drama

अजब

अजब

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है हवा के झोकै

फिर भी मूँछों पर

ताव दिये जा रहे हैं।


खुद किश्तों पर जी रहे,

दूसरों को सुझाव

दिये जा रहे हैं।



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