अगर तुम न होते--दो शब्द
अगर तुम न होते--दो शब्द
जिंदगी
आज जब हिसाब लगाता हूं
तो अकेले गुजारे पलों की दास्ताँ
उनके साथ बिताए गये पलों के जोड़ में कहीं खो जाती है-
और मेरे दिल के कैनवास पर
उनकी कांपती हुई उंगलियों से लिखी जीवन की कहानी ही अपनी और अपनी होकरआंखो के सामने नजर आती है-
आज सोचता हूं कि
अगर तुम मेरा हाथ थाम कर न चले होते-
तुम्हारी झील से गहरी आंखों में
मेरी जिन्दगी के अहसास भरे सपने न पले होते-
राह में बिखरे कांटो पर
यदि तुम्हारे प्यार का आंचल न फैला होता-
तो मैं जिंदगी की जद्दोजहद में
थक हार कर कहीं अनजान सा पड़ा होता-
तुम मेरे अंधेरे जीवन में
कभी महताब तो कभी आफताब बन रोशनी फैलाती रही-
जो कह न सका पुरूषत्व के दंभ में शायद
आज कहता हूं कि मेरी जिन्दगी करने को रोशन
तुम अपने आप को जलाती रही-
आज स्वीकार करता हूं
जिंदगी के वह पल, वह अहसास, वह भाव
मेरे न होते-
मेरी जिन्दगी में अगर तुम न होते।

