अडिग रहो,बढ़ते चलो.!
अडिग रहो,बढ़ते चलो.!
रुको नहीं थको नहीं
तुम्हें बढ़ते ही जाना है,
हर मुश्किल के अंधियारे में
तुमको ही दीप जलाना है।
हिम्मत की इस नौका में
तूफानों से लड़ जाना है,
जो कहे ये कार्य असंभव
उनको करके दिखलाना है।
चोट लगे तो सह लेना,
पर हार नहीं स्वीकार करो,
टूटे सपनों की बुनियाद पर,
तुम फिर से संवाद करो।
राह कठिन हो चाहे जितनी
तुम पीछे मत हट जाना,
जंगल, पर्वत, तूफानों में
बस तुमको है बढ़ते जाना।
लोग हंसेंगे, रोकेंगे तुमको
ताने देंगे राहों में,
तुम बस लक्ष्य पर टिके रहना
मशाल लिए हाथों में।
दुनिया की परवाह छोड़ो
सपनों को सच करना है,
ज्वाला सीने में धधका कर
हर मुश्किल को हर लेना है।
गिरो, उठो, फिर से दौड़ो
रुकने का ना नाम लो,
अपनी शक्ति तुम पहचानो,
खुद को तुम मान दो।
जीत तुम्हारी ही होगी
ये विश्वास रखो अपने दिल में,
घोर अंधेरा भी छंट जायेगा
तेरी उम्मीदों की रोशनी में।
तो उठो चलो अब रुको नहीं
संघर्षों को स्वीकार करो,
जो बाधाएं पथ में आएं
उनका तुम सत्कार करो।
तुझमें है शक्ति अपार
बस खुद को तुम्हें आजमाना है,
संकल्प का दीप जलाकर
तुम्हें आगे बढ़ते जाना है।
