अभावों से भरी ये जिंदगी
अभावों से भरी ये जिंदगी
अभावों से जन्मी पली हुई ऐ ज़िन्दगी,
अब मेरे घर ना आना तू फिर से कभी!
मेरे जीवन में हमेशा खुशियां छाई रहे,
ना शिकन मेरे मस्तक पर लाना कभी !
सुख की निद्रा में ही मुझको सोने दे अब,
दे के मुझे ठोकर ना फिर से जगाना कभी!
कैसे सीखूं भला मैं सबके बीच रहना यहाँ,
ज़रा आ के फिर से तू मुझको बताना कभी !
पल में बदलते हैं रिश्ते आज के इस दौर में,
कौन अपना और कौन पराया बताना कभी !
