आज़ादी के बिखरे रंग!
आज़ादी के बिखरे रंग!
1947 की स्वतंत्रता की थी कुछ अलग ही बात,
लहराया था तिरंगा ऊँचा और ना सोया कोई उस रात
सुनहरे भविष्य के लिए देखा मिलकर सपना
सर्व धर्म के संग करना था सबको अपना।
दिन गुजरे और गुजरे कई साल,
धर्म और जातिवाद का हुआ बुरा हाल
आज़ादी के पर्तो पे चढ़ा अविश्वास का जाल,
भाई ही भाई का बन गया मृत्यु का काल।
खौफ और बेबसी का छाया ऐसा मंजर,
शब्दों के बीच खेल रहे हैं खूनी खंजर
प्रेम भरे भाषा में लिपटा है नफरत का अंगार,
ना जाने इस सियासत में उजड़े कितनों के श्रृंगार।
रहना था जिनको अपने ही घर में बन के शहज़ादी,
दबाया गया उनका गला समझ के उनको बर्बादी
पुत्र की चाह ने कितनों ने बढ़ाई अपनी आबादी,
क्या मिली उन बेटियों को उनके अपनों से आज़ादी?
झूठी मर्दानगी ने लूटा कितनों का चमन,
उम्र हो छोटी या बड़ी, ना दिखा किसी का दामन
ढलते सूरज संग ना छोड़े जो अपनों का आँगन
गली मुहल्लों ने लाया इनके आज़ादी पे अड़चन।
क़ानून व्यवस्था चंद शक्तियों की मोहताज़ हो गयी,
आम आदमी की पूंजी महंगाई में बह गयी
काला बाज़ारी चरम सीमा में आ गयी,
वीरों की बलिदानी किसी ख़्वाबों में खो गयी।
दोस्तों, देशभक्ति को अपने जुबान की मांग ना रखो,
मानसिक पराधीनता की बेड़ियों को तो जरा परखो
देश के सम्मान पर अग्रसर हो के चलना सीखो,
असमाजिक तत्वों को दूर कर अपने देश को
सभी के लिए स्वतंत्र भारत बना के तो देखो।
