STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Abstract

4  

Surendra kumar singh

Abstract

आमंत्रण

आमंत्रण

1 min
262


आमंत्रण तो था ही

और जब वहां पहुंचा

तो मेला सा था ।

नृत्य चल रहा था

उमंग की धुनि पर,

खुशी नाच रही थी

तन्हा,तन्हा,

पुरुषार्थ के रंग में रंगी,

सफलता गुनगुना रही थी,

अपनापन रिश्तों के

गले लग रहा था,

आनन्द सावन की फुहारों

की तरह बरस रहा था,

प्रेम में डूबे हुये लोग

खोए हुये थे

एक दूसरे की बाहों में,

और मां इस चलते हुये

अद्भुत उत्सव में

मुझे देख देख मुस्करा रही थी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract