STORYMIRROR

VIVEK ROUSHAN

Abstract

4  

VIVEK ROUSHAN

Abstract

जिंदगी की धूप

जिंदगी की धूप

1 min
297

राह पर चलते हुए

धूप में जलते हुए

मैंने ये महसूस किया है की

जिंदगी की

धूप से बड़ी कोई धूप नहीं


क्यूँकि इस धूप के मद्धम होने

का हम सिर्फ इंतज़ार कर सकते हैं

निश्चिन्त नहीं हो सकते की

शाम होते हीं सूरज ढल जाएगा।


धूप से राहत मिलेगी

सांय का छाया मीलेगा

रात को अपने आलिंगन में भरकर

हम चैन से सो जाएंगे 

फिर सूरज को खिलता देखेंगे।


भोर को हँसता देखेंगे

और हम अपना 

सारा का सारा 

दुख भूल जाएंगे।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract