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VIVEK ROUSHAN

Abstract


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VIVEK ROUSHAN

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घर के ना रह

घर के ना रह

1 min 275 1 min 275

हम  घर में  रहें पर  घर के ना रहें

परिंदे भी कभी इक शज़र के ना रहें


मन  टूटता  रहा  पाँव  चलता  रहा

हम सफर में रहें पर सफर के ना रहें


इक दर से निकल दूसरे पे दस्तक दी

हम दर-दर भटके पर किसी दर के ना रहें


जहाँ भी गए हम खुद अकेले ही गए

कहीं भी रहें हम किसी से डर के ना रहें


इक नज़र में ठहरे थे हम कुछ देर के लिए

उस नज़र के बाद हम किसी नज़र के ना रहें।


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