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VIVEK ROUSHAN

Abstract


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VIVEK ROUSHAN

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रोज़ पुकारा करते हैं

रोज़ पुकारा करते हैं

1 min 270 1 min 270

तेरे बाद भी तेरे साथ वक़्त गुज़ारा करते हैं

रोज़ सोचते हैं तुम्हें रोज़ पुकारा करते हैं


दिन तो जैसे-तैसे गुज़र ही जाता है जानाँ

रात होते ही तुझे खुद में उतारा करते हैं


रौशनी हमसे  दूर बहुत दूर भागा करती है

हम अँधेरों के साए में जिंदगी गुज़ारा करते हैं


हम वो लोग हैं जो टूटते नहीं आसानी से

गर कभी टूटते हैं तो दूसरों को सँवारा करते हैं


बहुत भटके हैं यार तेरी इश्क़ गलियों में हम

अब उन गलियों में जाने से हम किनारा करते हैं।



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