STORYMIRROR

VIVEK ROUSHAN

Abstract

4  

VIVEK ROUSHAN

Abstract

जितना समझ आया

जितना समझ आया

1 min
273

जितना समझ आया उतना लोगों ने समझा मुझ को

किसी ने कहा अपना तो किसी ने समझा पराया मुझ को


पल-दो-पल की मुलाक़ात में हम नहीं खुलते किसी से

कभी साथ बैठना मेरे फिर ध्यान लगाकर पढ़ना मुझ को


मैं अपने ही तरह के एक शख्स की तलाश में था

ढूँढ़ने निकला तो किसी ने दे दिया एक आईना मुझ को


तू खुदा है सबसे कहता फिरता है की मैं तेरा बंदा हुँ

मैं उलझ गया हुँ किसी रोज़ वक़्त दे कर सुलझा मुझ को


यूँ तो मैं चट्टानों से भी टकराने का हौंसला रखता हुँ

पर कभी दर्द दे जाता है एक छोटा सा तिनका मुझ को 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract