STORYMIRROR

Kavita Sharrma

Abstract

4  

Kavita Sharrma

Abstract

बूंद

बूंद

1 min
202

शबनम की इक बूंद ने 

रात भर खुद को महफूज़ रखा


सूरज की किरणों ने दो पल में 

उसका वजूद हटा दिया


जिंदगी ‌में भी हम बहुत कुछ 

संभाल कर रखते जाते हैं


पर बूंद की तरह हम भी  

इक दिन मिट ही जाते हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract