आखिर कैसे
आखिर कैसे
लोगों के सामने नजरअंदाज करके
फिर अकेले में मिलने आते हो
तुम कहते हो प्यार है मुझसे
अरे किस मुँह से ये बताते हो
मेरा साथ तुम्हें बेज्जत करता है
तो फिर चले जाते क्यों नहीं?
अगर कोई और बात है तो
साथ बैठकर बताते क्यों नहीं?
आखिर क्यों यह ढोंग रचाते हो
तुम प्यार और फरेब का मुझसे
आखिर क्या गुनाह है मेरा
यही ना कि इश्क किया है तुझसे
मेरे साथ कभी भी होतें हो तो
किसी और की बात करते हो
कोई साथ तुम्हारे नहीं होता तो
सिर्फ मेरे साथ फिर रहते हो
तुम्हें दोस्ती भी चाहिए और
तुम्हें प्यार भी चाहिए पर
मैं अगर तुमसे कुछ चाहूं तो
तुम्हें किसी और का वक्त चाहिए
आखिर कैसे कर लेते हो तुम
हर बात में किसी तीसरे को शामिल
क्या तुम्हारे पास कुछ ऐसा है
जो हैं सिर्फ हम दोनों के काबिल
आज जा रहीं हूँ तुम्हारी ज़िंदगी से
बिना बताएं तुम्हें अकेले छोड़कर
खत में बता देना कैसे रहते हो
आखिर तुम मुझसे मुंह मोड़ कर ?
