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ज़िन्दगी के रंग
ज़िन्दगी के रंग
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© Ritu Verma

Drama

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धड़कते हुए दिल से नताशा ने सोशल में प्रवेश किया और उसकी निगाहें चारों तरफ किसी को ढूंढ रही थी कि उसने ग्रे टीशर्ट और ब्लू जीन्स में बैठे हुए नितिन को पहचान ही लिया. नितिन अपने मोबाइल में व्यस्त था ,नताशा को समझ नही आ रहा था कि कैसे पहल करे फिर भी धुकधुक करते हुए दिल की धड़कन को संभालते हुए वो नितिन के सामने खड़ी हो गयी और धीरे से बोली " हेलो नितिन, पहचाना मुझे"

नितिन एकाएक अचकचा गया और हँसते हुए बोला" और कौन होगा मेरी फेसबुक परी नताशा के अलावा"

नितिन की इस बेफिक्र हँसी के साथ नताशा की हिचकिचाहट भी दूर हो गयी और वो जैसे ही बैठने के लिए कुर्सी खिसकाने लगी कि नितिन एकाएक उठा और उसे कुर्सी पर बैठाते हुए बोला" मैडम बैठिए और फरमाइए कैसा लगा हूँ मैं आपको?"

नताशा होले से मुस्कुरा दी क्या जवाब देती।

नितिन शरारत से बोला" नताशा तुम्हारे गाल सोलह वर्षीय लड़की की तरह गुलाब की तरह खिल रहे हैं और तुम तस्वीर से भी ज्यादा खूबसूरत हो"

नताशा ने पलके उठा कर नितिन की तरफ देखा तो नितिन भी उसकी तरफ ही देख रहा था ,दोनों की नज़रे टकराई और दोनों फिर मुस्कुरा दिये।

नताशा को कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करे तो वो अपने स्टेप कट बालो से खेलने लगी,उसने नीली स्कर्ट,लाल कुर्ती पहनी हुई थी और साथ मे थी कान में बड़ी बड़ी चांदी की बालियां और हाथों में चांदी की चूड़ियां, 42 वर्ष की होने के बावजूद भी 32 वर्ष से ज्यादा की नही लगती थी ,भगवान ने उसे कुछ ऐसी ही शारीरक गठन दी थी।

उधर नितिन भी अपनी ऑंखों से नताशा के सौंदर्य को पी रहा था. वो 45 वर्ष का एक हंसमुख इंसान था,ज़िन्दगी को ज़िंदादिली से जीने वाले. पत्नी से एक वर्ष पहले तलाक ले चुका हैं. नितिन भारतीय होकर भी यूरोपियन सोच रखता था उसकी बहुत सारी महीला मित्र थी,जिन्हें वो जब तब मिलकर अपनी ज़िंदगी रंगीन करता था।

नितिन और नताशा को नही मालूम था कि आज की मुलाकात उनकी ज़िन्दगी को किस दिशा में ले कर जाने वाली हैं।

नितिन ने अपने लिए एक लार्ज विस्की तो नताशा ने अपने लिए कॉस्मोपोलिटन आर्डर किया.दोनों एक दुसरे से फेसबुक के द्वारा परिचित हुए थे. फिर और भिन्न प्रकार के माध्यमो से चैटिंग करने लगे थे, एक माह के भीतर ही नितिन नताशा से मिलने के लिए बैचैन हो उठा था क्यूंकि वो उसकी और महिला मित्रों से थोड़ी भिन्न थी,उसमें अभी भी वो मध्यम वर्गीय नारी सुलभ लज्जा थी और साथ में थी आधुनिक सोच,चीज़ों को अपने ही तरीक़े से देखने की क्षमता।

नितिन नताशा को कम्फ़र्टेबल बनाने की पूरी कोशिश कर रहा था,नताशा के हावभाव से नितिन को ऐसा लग रहा था जैसे वो पहली बार ऐसे किसी से मिलने आयीहो।

खाना आ गया था पर नितिन ने देखा की नताशा की आंखों में से टप टप आँसू बह रहे हैं. वो धीमी आवाज़ में बोला" क्या हुआ नताशा, तुम ठीक तो हो"

नताशा कुछ ना बोली पर उसकी आँखें गीली थी. नितिन मन ही मन चिढ़ उठा और थोड़ा सख्ती से बोला' नताशा ये तमाशा मत करो, सब देख रहे हैं, तुम अपनी मर्ज़ी से ही आयी हो,मैंने क्या तुम्हारे साथ क्या कोई बदतमीज़ी करी हैं"

नताशा को अपना व्यवहार खुद ही अपरिचित लग रहा था वो अपनी मर्ज़ी से नितिन से मिलने आयी थी पर इन रास्तों के कायदों से वो पूरी तरह अनजान नही थी. इन मुलाकातों की परिणीति क्या होती हैं,उसे भली भांति मालूम था पर फिर भी वो आज फिर से अपने आप को नितिन से मिलने से रोक नही पाई, उसे ये खुद नही मालूम था वो किस बात पर आंसू बहा रही हैं। अपने समाज के मुताबिक अमर्यादित आचरण पर या अपनी बेबसी और लाचारी पर,समाज के नज़रो से वो अभी तक एक खोखली शादी में बंधी हुई हैं,एक किशोर बेटी की माँ हैं. पर फिर क्यों वो अपने को रोक नही पाती हैं,क्यों उसको एक पुरुष स्पर्श और साथ की चाह रहतीहैं।

उसे हर बार उसकी माँ सत्संग में उठने बैठने की सलाह देती हैं . बहुत बार सामने से भी उन्होंने कहा"

नताशा तुमको सत्संग में जाना चाहिये, इससे तुम्हे मानसिक शांति मिलेगी"

पर नताश को समझ नही आ रहा था या तो वो कुछ अलग हैं या समाज में औरत को किस प्रकार की इच्छा करने का भी हक़ नही है. हाँ वो एक खराब रिश्ते से गुजर रही हैं और उसका कही कोई समाधान नही हैं पर अपनी भावनात्मक और शारीरक जरूरतों का वो क्या करे? भावनात्मक जरूरतों के लिए फिर भी उसके पास उसकी सहेलियां हैं पर शारिरिक जरूरतों का वो क्या करे? ये एक भँवर हैं जिसमें ना अंदर जाने का रास्ता मालूम हैं ना ही बाहर आनेका।

नताशा ने पनीली पलके उठाकर नितिन की तरफ देखा, नितिन का दिल पसीज उठा,उसे अपने पर ही गुस्सा आया क्यों वो हर औरत को एक ही नज़र से देखता हैं. उसने और नताशा ने भी खूब बातचीत करी हैं फ़ोन पर भी जो हर बार मर्यादित आचरण में नही आती, फिर क्यों नताशा निशब्द आँसू बहा रही हैं.

मौन पसरा रहा दोनों की बीच कुछ देर तक,जहाँ नितिन खाना खा रहा था वहीं नताशा खाने के साथ खेल रही थी, नितिन ने बिना कुछ बोले खाना निबटाया और दोनों पार्किंग की तरफ चल पड़े जहाँ नितिन की कार पार्कथी।

कार में बैठते ही नितिन अपना संयम खो बैठा और उसने नताशा का चेहरे अपने हाथों में ले लिया ,नताशा ने अपनी आँखों को मूंद लिया बिना कोई प्रतिक्रिया किये,नितिन को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो एक शिकारी हो और नताशा का शिकार कर रहा हो.झुंझला कर उसने नताशा को छोड़ दिया और बोला" मैं क्या तुम्हें कोई विलेन लगता हूँ"

नताशा कुछ ना बोली ,अब उसका मौन नितिन की बर्दाश्त से बाहर था . वो बोला" नताशा हुआ क्या हैं"

नताशा बोली" कुछ नहीं ,मुझे लगा था कि हम एक दूसरे को समझेगे "

नितिन ने ठहका लगाया और बोला"नताशा हम क्या कोई रिश्ता जोड़ने आये हैं, मैं तो पहले दिन से ही अपने एजेंडे पर क्लियर हूँ,हम साथ हैं बस मस्ती के लिए,मुझे तुम पसंद हो और शायद तुम भी मुझे पसंद करती हो"

नताशा को नितिन की बात में कड़वाहट, बेशर्मी पर सच्चाई भी लगी,कम से कम वो प्यार के सहारे तो उसे बिस्तर पर नही ले जा रहा हैं. उसका मन कैसला हो उठा.

नताशा ने अपना मौन तोड़ा और बोला" तुम सही बोल रहे हो,पर बिना भावना के तन के समपर्ण का मेरे लिए कोई मायने नही हैं"

नितिन हँस कर बोला" ख्वामख्वाह भावना को बीच मे ना लाओ,मैं उससे घर पर ही परेशान था ,इसलिए उससे अलग हो गया"भावना नितिन की भूतपूर्व पत्नी का नाम हैं.

नताशा को भी हंसी आ गयी. नितिन बोला" ऐसे ही मुस्कुराती रहा करो बहुत खूबसूरत लगती हो"

फिर दो घंटे तक वो कार में घूमते रहे.इस बीच वो दोनों एक दुसरे के बारे में काफी कुछ जान चुके थे. नितिन जान चुका था कि नताशा की ज़िंदगी बहुत उलझी हुई हैं,,उसका पति उससे अलग रहता हैं,,वो शायद प्यार की तलाश में इधर उधर भटक रही हैं पर मन ही मन ये सोच कर नितिन को हँसी आ गयी" और मिला भी तो इसे कौन मै ,जिसका प्यार से कुछ लेना देना नही हैं"

नताशा जब नितिन के पास जा रही थी तो बहुत डरी हुई थी पर अब वो काफी हद तक नॉर्मल हो गयी थी.

नितिन को नताशा का भोलापन बहुत भा गया था और जाने से पहले वो बस उसका हाथ पकड़ कर बोला" सब ठीक हो जाएगा ,चिंता मत करना,हर रात की सुबह जरूर होती हैं, ये वक़्त भी गुजर जाएगा"

इतनी देर में नितिन ये जरूर समझ गया था कि नताशा अंदर से टूटी हुई हैं,एक टूटे हुए रिश्ते के कांच से वो अब तक लहूलुहान हैं और उसे बहुत संभल कर आगे बढ़ना होगा. एक मन किया वो क्यों उसके लिए इतना द्रवित हो रहा हैं. आगे से खुद ही बात चीत कम कर देगा और वैसे भी उसे रिश्तों और भावनाओं में घुटन होती है. उसका पिछले कई वर्षों से बस ऐसे ही रिश्ते चल रहे हैं जो दो चार माह तक देह से देह तक ही चलते हैं. फिर दोनों अपने अपने घर खुश.

नताशा से जब तक वो बात करता था उसने उसकी हंसी की खनक में कभी भी अकेलेपन की आवाज़ नही सुनी थी.आज रूबरू मिलने पर उसे सच्चाई मालूम हो गयी थी.

उधर नताशा वापसी में सोच रही थी कि नितिन के साथ उसने दोस्ती चाही थी ,ऐसा दोस्त जिसे वो अपने मन की बात कह सके पर उसे भी औरों की तरह बस सतही बातों से मतलब हैं. अंदुरुनी हकीकत से वो भी दूर भागता हैं.

नताशा घर पहुंच कर अपने खयालो में ही खोई हुई थी कि तभी उसकी माँ बोली" नताशा फ्रिज फिर से खराब हो गया हैं,तुम मैकेनिक को फ़ोन कर दो"

माँ की बात को सुनते हुए नताशा बोली" माँ, ऊर्जा टयूशन से वापिस आ गयी क्या'

माँ ने बोलना आरंभ कर दिया" हमे क्या पता , मुझे क्या कुछ समझती हैं, मेरे रोकने टोकने पर तो तुम्हे भी एतराज हैं,इसलिए तुम्ही देखो'

नताशा के जेहन में और सुनने की क्षमता नही थी,इसलिए पहले उसने मैकेनिक और फिर ऊर्जा को मोबाइल लगाया.

ऊर्जा ने रूखी आवाज़ में उतर दिया" मम्मी आज इतनी जल्दी कैसे आ गयी और फिर अपनी माँ के बजाय मेरी याद कैसे आ गयी"

नताशा की आंखों में बेबसी के आँसू आ गए.पिछले पाँच वर्षों से वो ऐसे ही संघर्ष कर रही हैं. उसे अपनी गलती भी समझ नही आ रही हैं.पति के साथ जब उसके वैचारिक मतभेद बहुत अधिक हो गए तो उसने उससे अलग होने में ही भलाई समझी, पति ने कभी भी अपनी कोई जिम्मेदारी नही समझी थी,पहले भी नताशा ही पूरे घर का खर्च उठा रही थी और अब भी वो ही कर रही थी.पति को बल्कि इसमें अपना फायदा ही नज़र आया. अब वो आज़ाद पंछी की तरह इधर उधर डोल सकता था.गाहेबगाहे जब इच्छा होती तो ऊर्जा को जेबखर्च दे जाता।

पहले नताशा ने तलाक की सोची पर लंबे कानूनी पचड़ों के लिए ना उसके पास समय था,ना ही हिम्मत और सबसे बड़ी बात ना ही धन था.इन सब बातों का सबसे अधिक प्रभाव ऊर्जा पर हुआ था वो सबसे कटी कटी रहने लगी थी, नताशा बहुत कोशिश करती पर जीवन की भागदौड़ में वो फिर भी उसकी परफेक्ट मॉम ना बन पाती.

पति से अलग तो हो गयी थी वो पर एक हीनभावना उसमे घर कर गयी. वो अपने पति को बांध कर नही रख सकी बहुत बार संकेतो से लोग उसे समझा चुके थे ,इसलिए वो घंटो आईने के सामने खड़ी रहती अपने अक्स को ढूंढती हुई.फिर शुरू हुआ पुरुष मित्रो का सिलसिला, ये मित्र उसके किसी काम के नही हैं,ये बात जानते हुए भी वो हर पुरुष को अपनी ज़िंदगी मे शामिल करती शायद अपने को ये दिलासा देने के लिए कि वो अभी भी पुरषो को लुभा सकती हैं.कुछ पुरषो ने तो प्यार का नाटक कर के उसका एकदो बार उपभोग करके उसे अपनी ज़िंदगी से फ़ेक दिया. पर नताशा की प्यार की तलाश ख़त्म नहीं हुई

ज़िन्दगी में उसे कोई ऐसा साथी चाहिए था जो देह के परे देख सके,इसलिए आज तीन वर्ष पश्चात वो फिर से नितिन से मिलने चली गयी थी,पर निराशा ही हाथ लगी ,यद्यपि नितिन औरो से अलग था क्योंकि उसने उस दिन बिना कोई नाटक करे अपनी बात बता दी थी जो कड़वी थी पर सच्ची भी थी.

रात को खाने की मेज पर तनाव ही व्याप्त रहा और नताशा ,ऊर्जा और माँ के बीच सौहाद्र बनाने की कोशिश करती रही.नताशा की माँ उसके साथ पिछले पाँच वर्षों से रह रही हैं,नताशा के पापा के गुजरने के बाद वो भैया के घर मे एक अनावश्यक समान की तरह थीं ,यहां पर उन्हें फिर से पूरी गृहस्थी पर हुकुम चलाने का मौका मिल गया था पर फिर भी वो कोई मौका नही छोड़ती थी ,नताशा को ये जताने का कि उनका बुढ़ापा खराब हो रहा हैं.वो अलग बात हैं कि यहां पर नताशा ने सब कामवाली लगा रखी हैं बस माँ को काम वाली का निरीक्षण करना होताहैं।

रात में नताशा लेटी ही थी कि उसने देखा नितिन का मैसेज था . उसने भी जवाब दिया और फिर सो गई.

अगली रोज़ सुबह तड़के ही उसे ऑफिस के लिए निकलना था,जैसे ही मोबाइल ऑन किया तो देखा नितिन के दो मिस्ड कॉल थे. उसे समझ नही आया आखिर नितिन चाहता क्या हैं. उसने बस एक गुड मॉर्निंग का कोई मैसेज फॉरवर्ड किया और वो अपने ऑफिस चल पड़ी।

उधर नितिन को समझ नही आ रहा था कि जो नताशा मिलने से पहले उसको रात दिन मैसेज करती थी आज अचानक से चुप क्यों हो गयी.

नताशा को कुछ समझ नही आ रहा था कि उसकी जिंदगी किस मोड़ पर आ गयी हैं.

तीन दिन बीत गए थे पर नताशा और नितिन के बीच कोई बातचीत नही हुई. जहाँ नताशा ने अपने मन को समझा लिया था कि उसका और नितिन का आगे कोई भविष्य नही हैं क्योंकि दोनों का नज़रिया अलग था इस रिश्ते को ले कर.

नितिन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी और उसने शाम को नताशा को फ़ोन लगा दिया था.नताशा ने अचरज़ भरी आवाज़ से फ़ोन उठाया "हाँ बोलो नितिन"

नितिन ने ठहाका लगाते हुए बोला" मैडम क्या बात मैं आपको पसंद नही आया"

नताशा बोली"नही ऐसी कोई बात नही पर तुम्हारे और मेरे विचार अलग हैं और फिर मुझे एक दोस्त चाहिए था और तुम्हें बस मस्ती करने के लिए साथी"

नताशा और नितिन के बीच मौन पसरा रहा.नितिन ने कुछ नही कहा और बस ये बोल कर फ़ोन काट दिया "हाँ मुझे भावनओं से चिढ़ हैं पर एक दोस्त के रूप में मैं हमेशा खड़ा रहूंगा'

नताशा को नितिन के विचार समझ नही आ रहे थे . पर फिर वो अपने काम में जुट गई.

आज की शाम फिर अकेली थी ,ऊर्जा अपनी दोस्त के पास गई हुई थी और माँ भैया के पास. ना जाने क्या सोचते हुए ,नताशा ने फिर से नितिन को फ़ोन मिला लिया. उधर नितिन ने चहकती हुई आवाज में बोला"

हाँ जी मैडम,कैसे याद किया मुझे"

नताशा थकी हुई आवाज में बोली" नितिन एक दोस्त से बात कर सकती हूँ'

नताशा की आवाज में ना जाने कैसा दर्द था कि नितिन के मुँह से बरबस निकल गया" नताशा आज डिनर पर मिलोगी पर प्रॉमिस करो की गंगा जमुना नहीं बहायोगी"

नताशा बोली" ठीक हैं"

नताशा ने समय के अनुकूल आसमानी रंग का मुकेश के काम का कुर्ता प्लाज़्ज़ो पहन लिया,मोतियों की लड़ी पहन ली और मैजंटा शेड की लिपस्टिक और गहरा काजल लगाया. अपने को आईने में देखकर वो संतुष्ट थी.

दोनों एक दूसरे के आमने सामने थे और पूरे तीन घंटे तक नितिन ने बहुत ही प्यारे मेज़बान की तरह नताशा का ख्याल रखा.नताशा ने देखा रात के दस बज गए थे.वो कैब बुक करने लगी तो नितिन बोला"नताशा अगर तुम्हें कोई समस्या नही हो तो मैं ही तुम्हे ड्रॉप कर दूंगा".

नताशा ने बोला " ठीक हैं चलो"

जब नताशा उतरने लगी तो बोली " नितिन अंदर चलो कॉफ़ी पी कर जाना"

नितिन झिझकते हुए बोला" मन तो मेरा भी हैं पर ऊर्जा और आँटी को मेरा क्या परिचय दोगी"

नताशा बोली" दोस्ती का क्या कोई परिचय देना होता हैं"

अंदर पहुंच कर देखा, घर खाली था. ये देखते ही दूबारा से नितिन के अंदर का शिकारी जाग उठा और उसने नताशा को अपने आगोश में ले लिया. नताशा तो पहले थोड़ा घबरा गई. फिर एकाएक उस पर चंडी सवार हो गयी और उसने जोर से एक थप्पङ नितिन के गाल पर लगा दिया।

नितिन ने नताशा को हमेशा मौन ही देखा था,इसलिए वो इसके लिए प्रस्तुत ना था. उसने दूबारा से कोशिश करनी चाही पर नताशा ने इस बार और अधिक जोर से विरोध किया और ग़ुस्से में चिल्लाते हुए बोली" तुम्हे समझ नही आता हैं क्या मैं जो बोलती हूँ, मैंने पहले भी ये बात तुमको स्पष्ठ समझा दी थी. मेरी नहीं का मतलब नहीं ही हैं"

नितिन ग़ुस्से में फुफकारते हुए बोला" अच्छा फिर रात में जब तुम्हे मालूम था घर पर कोई नही हैं तो मुझे अंदर ले कर क्यों आई हो"

नताशा ने भी चिल्ला कर कहा" पहले अपना दिमाग़ का इलाज़ करा लो फिर मुझसे बात करना. मैं तुम्हे एक मित्रता के कारण ही अंदर लाई थी पर भूल गई थी तुम उसके लायक नही हो'"

नितिन चुपचाप गुस्से में निकल गया ,उसे उम्मीद थी कि नताशा अकेली हैं उसकी भी कुछ शारीरक जरूरते है इसलिए वो भले ही ऊपर से मना करे पर एक बार वो पहल करेगा तो वो भी खुद को रोक नही पाएगी.

नितिन को नताशा का ये दोगला चरित्र समझ नही आ रहा था,दोनों ही अपने अपने साथी से अलग रहते हैं तो नताशा उसकी पहल पर इतना बवाल क्यों मचाती हैं.

नताशा अब उसके लिए एक पहेली बन गयी थी वो उसे हर हाल में सुलझाएगा ये उसने तय कर लिया था.

उधर नताशा को नितिन का व्यवहार समझ नही आ रहा था. वो उसका चरित्र को समझने में असफल ही रही. हाँ उसे एक साथी की जरूरत थी पर इसका मतलब ये नही हैं कि वो उसके साथ दूसरी मुलाकात में ही एकाकार हो जाए.

मन ही मन वो मनन करते हुए वो सोच रही थी"शरीर की अपनी जरूरते हैं जिसको वो नकार नही सकती पर बिना मानसिक परिचय के वो किसी के साथ भी शरीर बाँट नही सकती"

कभी कभी नताशा अपने आप के लिए भी एक पहेली बन जाती. मन उसका उसको उड़ने के लिए कहता पर पैरों में पड़ी हुई मातृत्व और नारीत्व की बेड़ियां उसे उड़ने ना देती. क्या करे वो , शर्म आने लगती हैं उसे कभी कभी अपने व्यवहार से,क्यों नही वो और औरतो की तरह सत्संग और भक्ति में लीन हो जाती. क्यों उसका मन उसे उन राहों पर ले कर जाने को प्रेरित करता हैं जहां पर चलने से कांटे आवश्य ही चुभेगे.

मन की शांति के लिए उसने अपनी माँ के साथ सत्संग में भी जाना आरंभ किया. वहाँ पर औरतो की उत्सुक नज़रो के सवालों से बचने की भरसक कोशिश करती रही. फिर भी एक दो जुमले उसके कान में पड़ ही गए"बेचारी अलग रहती हैं, एक जवान बेटी भी हैं "

तभी दूसरा वाक्य कानो से टकराया" दिखने में तो इतनी बुरी भी नही हैं,पता नही पति ने दूसरी औरत क्यों कर ली हैं"

इस पर भी चर्चा शांत हो जाती तो गनीमत थी पर सब उसके जीवन के उलझे हुए रेशो को सुलझाने में लग गए वो अलग बात थी उनमे से बहुत सारे लोगो के खुद के भी रिश्ते रूपी धागे उलझे हुए थे पर मानव मन ऐसा ही हैं दूसरों की पीड़ा से वो अपनी पीड़ा की तुलना करते हैं और उसी में एक असीम आनंद पाते हैं. आँखों मे पानी लिए वो वापिस आ गयी और उसके बाद से नताशा की माँ ने भी कभी नताशा को साथ चलने को नही कहा.

इसी उधेड़ बन में समय बीतता गया. पर ऐसी ही कितनी काजल जैसी काली रातो ने उसे जीने की नई राह भी दिखाई हैं.मन ही मन वो अपनी ज़िंदगी के लिए कुछ तय कर चुकी थी.पहले वो एक बेटी के नज़रिए से ज़िन्दगी को देखती रही फिर एक पत्नी के जामे में उसने ज़िन्दगी को जिया,एक साल होते होते माँ बन गयी और मातृत्व के चश्मे से ही उसने ज़िन्दगी को जिया.इन सब के पीछे बहुत पीछे कहीं छूट गयी थी नताशा रूपी एक औरत,जो खुश रहना चाहती हैं,उड़ना चाहती हैं,खूबसूरत महसूस करना चाहती हैं, भीतर और बाहर से,जो ज़िन्दगी को अपने ढंग से जीना चाहती हैं.

आज बाहर से होली की टोली का शोर आ रहा था,किशोर लड़के और लड़कियों की रंगबिरंगी टोली हुल्लड़ करती हुई जा रही थी,आंखों में सतरंगी सपने लिए हुए. अब भी अक्सर नताशा अकेली ही रहती हैं पर अब उसे अपने अकेलेपन से शिकायत नही हैं क्योंकि उसने अपने आप से दोस्ती कर ली हैंउसने अपने मन को उन रंगों से भर लिया था ,जिन रंगों के लिए उसे किसीऔर साथी की आवश्यकता नही थी.

तभी मोबाइल की घंटी बजी ,दूसरी तरफ से ऊर्जा के चहकती हुई आवाज थी,ऊर्जा अब बीस वर्षीय खूबसूरत युवती थी जो ज़िन्दगी को भरपूर अपने लिए जीती थी .अपने से दोस्ती करते ही नताशा ने महसूस किया कि ज़िन्दगी भी अपने आप ही खुशनुमा रंगों से रंगीन हो उठी हैं. अपने लिए जैसे ही जीना शुरू किया किसी से कोई शिकायत नही रही.

सभी रिश्तेदारों और दोस्तो के होली के बधाई संदेशो का जवाब दे रही थी कि तभी मोबाइल की स्क्रीन पर एक अनजान नंबर फ़्लैश हो रहा था नताशा ने जैसे ही कॉल लिया,उधर से नितिन की वो ही खनकती हुई आवाज सुनाई दी और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में उसने कहा" मैडम याद हूँ या सदा के लिए भूल गयी हो"

नताशा बिना कुछ बोले मोबाइल को एकटक देख रही थी और अपनी ज़िंदगी के इस रंग का वो क्या करे, ये सोचते हुए उसने बिना कुछ बोले मोबाइल को स्विच ऑफ कर दिया.

ज़रूरत सोच दायरा औरत मर्द

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