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ये बच्चे कब समझदार होंगे
ये बच्चे कब समझदार होंगे
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© satish bhardwaj

Drama

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रघुवर प्रसाद जी अब सेवानिवृत्त हो चुके थे। वो अध्यापक थे। उनकी पहचान एक कर्मठ अध्यापक के रूप में थी। अपने कितने ही छात्रों से भावनात्मक रिश्ता था रघुवर जी का। सेवा निवृत्ति के उपरांत भी कितने ही ऐसे छात्र थे जो सफल थे और यदि कहीं मिल जाते थे तो रघुवर जी के पैरों में पड़ जाते थे। इस सम्मान के आगे अपनी अच्छी खासी पेंसन भी रघुवर जी को छोटी लगती थी। वो अक्सर कहते थे “हमने शिक्षा को संस्कार के रूप में विद्यार्थियों में रोपा है। अब तो शिक्षा भी सर्विस सेक्टर का हिस्सा है और शिक्षक के लिए छात्र एक ग्राहक है तो छात्र और उनके माता-पिता के लिए शिक्षक एक सर्विस प्रोवाइडर।” फिर वो एक लम्बी साँस खींच कर बोलते थे, “सही समय में जिंदगी गुजार गए हम....”

रघुवर जी के दो पुत्र थे और एक पुत्री। बड़ा पुत्र इन्द्र इंजिनियर था। वह अपनी पत्नी रेखा, एक पुत्र रोहन और एक पुत्री रोहिणी के साथ चंडीगढ़ में रहता था जबकि छोटा पुत्र राजेंद्र, रघुवर जी के साथ रहता था। वो एक अच्छी कम्पनी में नौकरी करता था। ठीक ही कमा लेता था। उसके भी एक पुत्र शिखर और एक पुत्री शिखा थी। रघुवर जी की पत्नी प्रेमलता और पुत्री आभा और छोटे पुत्र का परिवार उनके साथ पैतृक निवास में ही मेरठ में रहते थे। अभी पुत्री का विवाह नहीं हुआ था। बस ये ही एक चिंता रघुवर जी को थी की नौकरी रहते पुत्री का विवाह नहीं हो पाया। प्रेमलता जी भी थोड़ी परेशान थी इस विषय को लेकर। इस कारण से ही रघुवर जी ने अपने फंड को किसी को नहीं दिया था। वो सोचते थे की बस आभा का विवाह बिना पुत्रों पर जोर डाले ठीक से करके जो बचेगा वो पुत्रों को दे देंगे।

रघुवर जी जितने मृदुभाषी थे प्रेमलता जी उतनी ही कड़क स्वाभाव की थी। वो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी फिर भी किसी भी विषय पर अड़ जाना उनका स्वभाव था। रघुवर जी ने जीवन भर उनकी बात काटने की हिम्मत नहीं जुटाई थी। ये ही स्वभाव प्रेमलता का बहुओं के साथ भी था। बड़ी बहू आधुनिक परिवार से थी और प्रेमलता जी का बड़ा पुत्र भी अच्छा कमाता था इसलिए प्रेमलता जी की ज्यादा नहीं बनी बड़ी बहू से। पोती-पोतो की याद तो रघुवर जी और प्रेमलता जी को आती थी परन्तु प्रेमलता जी भी झुकने को तैयार नहीं थी इसलिए बस चल रहा था।

छोटी बहू रश्मि भी प्रेमलता जी के स्वभाव से कुंद थी लेकिन अपने पति के दबाव के कारण चुप थी।

प्रेमलता जी अक्सर ताना मार देती थी, “बड़ा मेहनत करके बड़ी पोस्ट पर चला गया अंधी कमाई है। एक तू है धक्के खाकर भी बस दस-हज़ार पर अटका है।

उसकी तो घरवाली भी एम.बी.ए. है। वो भी कमा लेगी। तेरी तो घरवाली भी बी.ए. ही है।”

इस बात पर रश्मि चिढ़ जाती थी और राजेंद्र से कहती थी, “हम कम कमाए या ज्यादा किसी से माँगने नहीं जा रहें हैं जो बड़े बहू-बेटे पूछते भी नहीं, बड़ाई उनकी ही होती है। जब देखो जरुरत बता कर पैसा माँग लेते हैं। हमने तो कभी नहीं लिया।”

राजेन्द्र, रश्मि से कहता था, “यार अब साठ साल की उम्र में माँ तो अपनी आदत बदल नहीं पाएंगी इसलिए थोड़ा हमें ही एडजेस्ट करना पड़ेगा, कहने दे ना।”

इस बात पर रश्मि तुनक कर जवाब देती थी, “हमारे भी माँ है उसके भी बहू है। हमारे वहाँ तो ऐसे नहीं होता।”

राजेंद्र ने पीछा छुड़ाने के अंदाज़ में कहा, “छोड़ ना यार।”

रश्मि ने झल्लाते हुए कहा, “क्या छोड़ दूँष माँग लिए दो लाख स्कूल की फ़ीस के नाम पर और कितनी बड़ाई में कहती है तुम्हारी माँ भी। इंद्र ने लॉन लिया है मकान और गाडी के नाम पर.. तनख्वाह तो उसमें चली जाती है। कहती हैं कि बच्चे महंगे स्कूल में है फ़ीस भी ज्यादा जाती है।”

कुछ देर चुप रहने के बाद फिर से रश्मि ने बोलना शुरू किया, “जरुरत-वरुरत कुछ ना है। बस, माल इकट्ठा करना है। वैसे तो बड़ी बहू यहाँ आती भी नहीं। जब जरुरत होती है तो पता नहीं कैसे मूड हो जाता है फोन करने का ? बस सारा फंड खींचने पर लगे हैं।”

राजेंद्र ने खीजते हुए कहा, “यार तुझे क्या दर्द है उनका पैसा है और वैसे इतना विश्वास रख, हिस्सा किसी का नहीं मरने देगी माँ।”

रश्मि ने भी गर्दन झटकते हुए कहा, “मुझे जरुरत नहीं है किसी हिस्से की। बस, मुझे गुस्सा जब आता है जब वो तुम्हें ये कहती हैं कि तुम्हारी कमाई उनके बड़े बेटे से कम है। कम है तो है...हम किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते। अपनी गुंजाइश के हिसाब से चलते हैं। मैं तो इतने पर भी खर्चीली लगती हूँ।”

राजेंद्र बाहर चला गया। इस तरह अक्सर विवाद हो जाता था। राजेंद्र ने भी अब महारत प्राप्त कर ली थी इस विवाद को झेलने में।

रघुवर जी की बड़ी बहू चाहे सास के पास आये या न आये लेकिन इंद्र और वो किसी न किसी रूप में अपनी जरूरतें इनसे जरुर पूरी कर लेते थे। इस बात को मेघा भी जानती थी लेकिन चुप रहती थी। हालाँकि उसे भी ये डर जरुर सताता था की इस तरह उसके माता-पिता उसकी शादी के लिए भी कुछ बचायेंगे या नहीं।

बाहर ही बरामदे में कुर्सियाँ और सोफे पड़े थे जहाँ पर रघुवर जी और प्रेमलता जी बैठे थे और अपने पोते और पोती को खिला रहे थे। आभा अन्दर ही बैठी टी.वी. देख रही थी। राजेंद्र, रघुवर जी के पास आकर बैठ गया।

उनमे आपस में कुछ बातें होने लगी। तभी राजेंद्र के फोन पर रेखा का फोन आया। राजेंद्र उठ कर अलग चला गया। राजेंद्र ने काफी समय बात की वापस आने पर बोला, “माँ भैया-भाभी आ रहे हैं परसो।”

रघुवर जी झटके से उठे और बोले, “क्या बालक भी साथ आ रहे हैं।”

इंद्र ने सहमति में सर हिलाया।

बच्चे के आने की खबर सुनकर इंद्र, प्रेमलता जी, रघुवर जी, और आभा सभी खुश थे। लगभग तीन साल के बाद आ रहें थे बच्चे।

ये समाचार सुनकर आभा अपनी भाभी रश्मि के पास गयी और बोली, “देखा भाभी दो लाख का असर, तीन साल बाद भाभी घर आ रही हैं।”

रश्मि लम्बी साँस छोड़ते हुए बोली, “हाँ, देख रही हूँ।” रश्मि और आभा के मध्य रिश्ता मधुर था।

घर में सभी बहुत खुश थे इस समाचार को पाकर। देखते ही देखते वो दिन भी आ गया जब बच्चे घर आ गए। रोहन अब काफी जवान दिख रहा था। वो अब दसवीं कक्षा में आ गया था। आवाज़ भी थोड़ी भारी हो गयी थी। रोहिणी भी अब छोटी सी नहीं रह गयी थी वो भी अब सातवीं कक्षा में आ गयी थी। घर में हर्ष का माहोल था। आभा और रश्मि भी चहल-पहल में खुश थे और रेखा से खूब बातें कर रहें थे। रोहन और रोहिणी, शिखा और शिखर के साथ खेल रहे थे। शिखा अभी नौ साल की थी और शिखर मात्र पाँच साल का था। रोहन और रोहिणी भी बहुत खुश थे शिखर और शिखा को देखकर। दो दिन बित गए थे इंद्रा और रेखा को आये। अब बच्चे भी आपस में काफी घुल मिल गए थे।

बड़े अपने कामों में लगे थे और बच्चे साथ-साथ खेल रहे थे तभी रोहिणी के रोने की आवाज़ आई। आवाज़ सुन कर रेखा दौड़ी हुई आई तो देखा शिखा भी रो रही है। रोहिणी ने रेखा से रोते हुए कहा, “भाई ने मारा बहुत जोर से।”

रेखा ने गुस्से में रोहन की तरफ देखा तो रोहन एकदम से सफाई देने वाले अंदाज़ में बोला, “मम्मी, इसने पहले शिखा को मारा, जब मैंने मारा।”

रेखा को ये अजीब लगा की रोहन ने अपनी चचेरी बहन के लिए अपनी सगी बहन को मार दिया। शायद वो अनजान थी की बच्चे इन रिश्तों के गणित को नहीं समझते। रेखा ने अपने भावो को सँभालते हुए रोहन को डाँटते हुए कहा “तू ज्यादा बड़ा हो गया है ? हमसे कहता।”

रोहन ने तुरंत कहा, “मेरी बहन कितनी छोटी है ? रोहिणी इसे पिटेगी, तो मै इसे पिटूँगा।”

इतनी देर में ही प्रेमलता जी आ गयीं और बोली “चल छोड़ भी अब। आ बेटी रोहिणी, ये सब गंदे हैं तू मेरे साथ चल घुमा के लाती हूँ।”

इतना सुनते ही सारे बच्चे अपना झगड़ा भूल गए और सभी एक सुर में कहने लगे, “अम्मा मै भी चलूँगा घूमने-अम्मा प्लीज अब नहीं लड़ेंगे।” सब अपनी अम्मा के साथ घूमने चले गए।

ऐसे ही चहल-पहल में ये दिन भी बित गया। रात को शिखा ने रोना शुरू कर दिया की वो रोहन भाई के पास सोएगी। रोहन, इंद्रा और रेखा के कमरे में ही सो रहा था। शिखा भी वहीं सोने की जिद कर रही थी। ये देख कर रोहिणी, जो दादी के पास सो रही थी वो भी कहने लगी की मुझे भी मम्मी के पास ही सोना है।

इस सब के मध्य रोहन तपाक से बोल पड़ा, “चल रोहिणी तू अम्मा के पास सो.. हमारे पास शिखा सोएगी।”

इतने में ही रश्मि ने शिखा को समझाते हुए कहा, “बेटा आप हमारे पास सो जाओ वहाँ परेशान हो जाओगी।”

तुरंत शिखा बोल पड़ी, “नहीं मम्मी आप शिखर को सुला लो, मुझे रोहन भैया के पास सोना है।”

रश्मि, शिखा को खींच तान कर कमरे में ले आई। ये बात रेखा और रश्मि दोनों को परेशान कर रही थी कि उनके बच्चे रिश्तो में फर्क नहीं कर पा रहे हैं।

रश्मि ने कमरे में गुस्से से शिखा को सुलाया वो सुबक रही थी।

राजेंद्र भी लेटा हुआ था। रश्मि गुस्से में बड़बड़ा रही थी, “मेरे तो बच्चे भी पागल ही पैदा हो गए। ताऊ-ताई के पास सोएगी.. वो सुलाना भी चाहती हैं तुझे ?”

तुरंत शिखा ने लेटे-लेटे सुबकते हुए कहा, “सुला रहे थे आप ले आई...आप गन्दी हो।”

ये बात सुनकर रश्मि ने शिखा को जलती हुई निगाहों से देखा। शिखा भी चुपचाप रश्मि की बगल में दुबक गयी।

रश्मि ने फिर बडबडाना शुरू किया, “जब तेरे चोट लगी थी तो किसी ने फोन करके भी नहीं पूछा था। प्यार होता तो एक बार तो पूछते। जब शिखर बीमार हुआ था तो अपने मायके तो आ गयी थी पर तीस किलोमीटर चलके यहाँ तक नहीं आया गया। लड़ाई सास से थी या मेरे बच्चों से। वो तो बस पैसा लेने के समय याद आते हैं सास-ससुर और हम यहाँ रहते हैं इसलिए हमसे भी बोलना पड़ता है पर मेरे तो बालक भी बेवकूफ है पता नहीं कब अक्ल आयेगी इन्हें।”

इतने में ही राजेंद्र बोल पड़ा, “यार अब सोने भी दो|”

रश्मि तुनक कर बोल पड़ी, “सो जाओ जी लो कुछ नहीं बोलूँगी। बोलूँ भी कैसे, मेरी आवाज़ तो मेरा पति ही दबा देता है।”

कुछ ऐसा ही माहोल इंद्र और रेखा के कमरे में था। वहाँ भी रेखा, रोहन पर अपनी भड़ास निकाल रही थी, “तमीज़ तो है ही नहीं। इतना तेज़ मारा इसने रोहिणी के। मेरी बहन है ! उनकी माँ तो नहीं चाहती कि वो पास भी लगे तुम्हारे और एक ये है जो प्यार ढूला रहे हैं उन पर।”

रोहन सहमा सा बोला, “वो भी तो मेरी बहन ही है।”

रेखा तुरंत झिड़कते हुए बोली, “चुप कर...आया बड़ा भैया बनने वाला.. जानता नहीं है तुम्हारा ही हक खा रही है उनकी माँ यहाँ रहकर। सारा फंड खा रहे हैं। हमें तो कभी जरुरत हो तो हाथ फैला कर भीख माँगनी पड़ती है। उस पर भी मैं ही बुरी। आ जाते है बेशर्म बन कर। नहीं तो रश्मि और राजेंद्र तो चाहते ही नहीं की यहाँ आये। मेरे तो बच्चों के लिए भी वो ही अच्छे। पता नहीं कब बड़े होंगे मेरे बच्चे तो ?”

इस तरह रात गुजर गयी और अगले दिन फिर से वही दिनचर्या शुरू हो गयी। राजेंद्र नौकरी पर चला गया था। जबकि इंद्र कुछ पुराने मित्रों से मिलने बाहर गया था। घर में रघुवर जी, प्रेमलता जी, आभा, रेखा, रश्मि और बच्चे थे| रेखा और रश्मि अन्दर कुछ काम कर रही थीं। बाकि लोग सुबह का काम निपटा कर बरामदे में बैठे थे। और बच्चे खेल रहे थे। तभी बच्चो में किसी बात को लेकर लड़ाई शुरू हो गयी। अबकी बार लड़ाई रोहन और शिखा में हुई थी।

शिखा बल सुलभ मन थी बोल पड़ी, “मुझे पता है आप मुझे प्यार नहीं करते जब मेरे चोट लगी थी, देखने भी नहीं आये थे।”

इतना सुनते ही रोहन भी बोल पड़ा, “ज्यादा मत बोल यहाँ कोई नहीं चाहता की हम आये यहाँ पर। चाचा-चाची भी नहीं चाहते। उन्हें तो ये लगता है कि हम पैसे ले जायेंगे।”

शिखा भी बोल पड़ी, “पैसे ही तो लेने आते हो तुम। तुम दादा-दादी को प्यार ही कहाँ करते हो ? तुम उनसे पैसे लेने आते हो।”

रोहन भी बोल पड़ा, “तुम गन्दी हो और मेरी बहन तो बस रोहिणी है।”

शिखा भी बोल पड़ी, “मेरा भाई भी शिखर है।”

ये सब सुन कर रेखा और रश्मि भी भीतर से बाहर आ गए और दोनों बच्चों को चुप कराके अन्दर ले गए। रघुवर जी और प्रेमलता एकदम से चुप होकर बैठ गए थे। रेखा और रश्मि झेंप गयी थी लेकिन शायद दिल में कहीं सुकून था की अब उनके बच्चे समझदार हो गए थे|

आभा को मानो साँप सूंघ गया था|

गाँव नौकरी धन माँ-बाप

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