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काश

काश

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आज अपने 18 वर्षीय बेटे श्रेयश की अर्थी उठते समय रजनी अपने पति अजय के कंधे पर सर रखकर फुट फुट कर रो रही थी। अजय भी उसको सांत्वना दे रहा था। उनकी शादी को 20 वर्ष हो गए थे लेकिन आज पहली बार शायद वो एक दुसरे को सहारा देते दिखाई दे रहे थे।

अजय और रजनी के संबंधो में कभी मधुरता नहीं रही। रोज होने वाली छोटी-छोटी सामान्य घटनाएं भी विवाद का विषय बन जाती थी। श्रेयश के जन्म को एक वर्ष भी नहीं हुआ था कि दोनों अलग हो गये। लेकिन दोनों अलग भी नहीं हुए, अजय तलाक लेना चाहता था तो रजनी तैयार नहीं हुई। दोनों के मध्य मुकदमा हुआ। रजनी के परिवार ने अजय पर दहेज़ और घरेलु हिंसा का मुकदमा किया जिस कारण उसके परिवार को 2 वर्ष से ज्यादा जेल में भी रहना पड़ा। इसके बाद अजय ने भी रजनी पर चरित्रहीन होने के आरोप लगाये। तो रजनी ने भी अजय और उसके पिता पर चरित्रहीन होने के आरोप लगाये। उन दोनों की इस कानूनी लड़ाई में दोनों की ही तरफ से एक दुसरे को नीचा दिखाने को हर तरह के झूठ-सच आरोप लगाये गए।

श्रेयश की कस्टडी का मामला भी उनके तलाक के मुकदमें के साथ खींचता रहा। दोनों के ही माँ-बाप अब इस दुनिया में नहीं रहे थे। बस एक अजय ही था जो इनके इस विवाद में सबसे ज्यादा पिस रहा था। उसे होस्टल में पढ़ाने के लिए भेज दिया गया था। अजय और रजनी श्रेयश से मिलने तो जाते थे लेकिन श्रेयश ने कभी उन्हें एक साथ नहीं देखा था। जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ी वो भी इनके विवाद को समझ गया। उसने भी प्रयास किये लेकिन कुछ नहीं हुआ। श्रेयश ने नशे को अपना साथी बना लिया और पढ़ाई भी छोड़ दी। अब वो इन दोनों से ही दूर भाग रहा था।

अजय और रजनी को जानकारी मिली कि इनका बेटा अब जिन्दगी की आखरी सांस गिन रहा है।

अजय और रजनी श्रेयश के जीवन के आखरी 15 दिन उसके साथ रहे। जीवन में पहली बार वो साथ साथ भी रहे।

इन 15 दिन दोनों इतना रोये कि श्रेयश के दाह संस्कार तक तो दोनों की ही आँखों के आंसु जैसे सूख चुके थे।

अजय ने श्रेयश का अंतिम संस्कार अपने पैत्रक गाँव में ही किया था।

पहली बार अजय और रजनी में किसी भी विषय को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ था।

रजनी और अजय दोनों एक साथ बाहर पार्क में बैठे हुए थे। दोनों अपने ही ख्यालो में खोये थे। रजनी को याद आया कि बचपन में श्रेयश कैसे जिद करता था “मम्मी आप पापा के साथ क्यों नहीं आती। जब वो आतें हैं तो आप नहीं आती जब आप आती हैं तो वो नहीं आतें।”

रजनी टाल देती थी।

श्रेयश भी अपने ख्यालो में था। उसे याद आ रहा था जब श्रेयश ने उससे पहली बार कहा “पापा आप और मम्मी साथ क्यों नहीं रह सकते?”

अजय ने झल्लाते हुए कहा “उसके साथ कोई नही रह सकता, तू भी नही”

अजय मौन हो गया।

अजय ने रजनी की तरफ देखा, वो भी उसको ही देख रही थी।

दोनो के मस्तिष्क में श्रेयश के साथ बिताएं आखरी 15 दिन घूम रहे थे।

रजनी को याद आया जब श्रेयश ने उन दोनों से कहा था “मम्मी मैं हमेशा आप दोनों को साथ देखना चाहता था। जैसे और बच्चो के मम्मी-पापा होते थे। जब भी आप दोनों से साथ आने की बात की तो आप दोनों ने एक दुसरे के लिए बस आग ही उगली”

श्रेयश ने एक लम्बी सांस छोडकर कहा “मम्मी बुआ के यहाँ गया तो वहाँ सब लोग आप पर बहुत ही गंदे इल्जाम लगा रहे थे। और मामा के यहाँ गया तो वो पापा पर बहुत ही गंदे आरोप लगाते थे। इसलिए मैं ऐसे किसी के भी पास नहीं जाता था जो आप दोनों को जानता हो”

फिर श्रेयश ने अजय और रजनी की तरफ देखा और बोला “ पापा आप दोनों ने भी एकदूसरे पर बहुत गंदे गंदे इल्जाम लगाये थे। मम्मी इतने गंदे तो आप दोनों कभी भी नहीं हो सकते हो”

रजनी और अजय दोनों के आँखों से अश्रुधारा बह रही थी।

अजय ने श्रेयश के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा “बेटा तेरी मम्मी कभी गलत नहीं थी। वो बस उसे नीचा दिखाने के लिए मैंने ये झूठे इल्जाम उसपर लगाये।”

रजनी भी बोल पड़ी “बेटा हम दोनों ही एकदूसरे को नीचा दिखाना चाहते थे... हराना चाहते थे। मैंने हर इल्जाम झूठ ही लगाए इनपर। हकीक़त तो ये है कि हम दोनों कभी भी एक दुसरे को जान ही नहीं पाए”

इन 15 दिन के दौरान अजय और रजनी को एक दुसरे के सम्बन्ध में बहुत सी सामान्य जानकारियाँ पहली बार मालूम हो रहीं थी। कहने को उनकी शादी हुई थी, एक बच्चा भी हुआ था, और दोनों ने तीन वर्ष साथ भी बिताए। लेकिन वो कभी भी एकदूसरे के व्यक्तित्व से परिचित ही नहीं हो पाए।

अजय और रजनी दोनों ही अतीत की कल्पनाओं से बाहर आये और रजनी फिर से रोने लगी।

अजय ने रजनी के सर पर हाथ फिराते हुए कहा “अब सब कुछ ख़त्म हो गया”

रजनी ने शांत होते हुए कहा “अजय सच ही ना हम दोनों तो कभी एक दुसरे को पहचान ही नहीं पाए। माँ बाप ने हमारा रिश्ता तय किया था। लेकिन हमारी जिन्दगी का हर फैसला भी वो ही कर रहे थे। और तो और हमें साथ रहना है या अलग होना है ये फैसला भी हमारा कहाँ था? उन्होंने ही हमारे लिए किया”

अजय ने जमीन की तरफ देखते हुए कहा “ठीक कहा तुमने, हमने कभी ये जानने की कोशिश ही नहीं की कि हम एक दुसरे से चाहते क्या हैं? तुम्हारे माँ-बाप जो बोलते थे वो तुम सुनती और समझती थी और मेरे माँ बाप जो बोलते रहे वो मैं सुनता और समझता रहा। लड़ाई तो उनके इगो की थी जो हम लड़ते रहे जीवन भर”

रजनी ने अजय की तरफ देखते हुए कहा “बाद में वकीलो की सलाह पर हम चलते रहे। हमारे माँ-बाप के इगो की लड़ाई लड़ी हमने लेकिन उसे सबसे ज्यादा सहा हमारे बेटे ने। क्या मिला हमें? क्यों कभी भी एक बार भी हमने सारी दुनिया को भूल कर एकदूसरे के बारे में अपने बेटे के बारे में सोचकर कोई फैसला नहीं किया ? तुम वो करते रहे जो तुम्हारे माँ बाप को सही लगा और मैं वो करती रही जो मेरे माँ बाप को सही लगा। क्या हुआ परिणाम? मैं एक अच्छी बेटी, पत्नी और माँ नहीं बन पायी और तुम एक अच्छे बेटे, पति और बाप नहीं बन पाये”

अजय ने अपने हाथो में रजनी के हाथ को लेते हुए कहा “जिन माँ बाप के इगो की लड़ाई हमने लड़ी। वो चले गए हमें छोड़कर...लेकिन हम लड़ते रहे। रजनी दूसरा गलत है या सही इसको जानने के लिए उसे जानना पड़ता है। लेकिन हमने तो एक दुसरे को जानने की कोशिश ही नहीं की कभी”

रजनी ने एक करुण भाव चेहरे पर लाते हुए कहा “हमें एक दुसरे के लिए हमारे पेरेंट्स ने ही पसंद किया पहले”

अजय ने एकदम कहा “नही मुझे भी तुम पसंद थी”

रजनी ने प्रत्युत्तर दिया “मुझे भी तुम पसंद थे”

अजय ने लम्बी सांस खींचते हुए कहा “फिर क्या था जो हम साथ नहीं रह पाए”

रजनी ने कहा “तुम मेरे पेरेंट्स की एक्सेपटेसन पूरी नहीं कर पा रहे थे और मैं तुम्हारे पेरेंट्स की, हम दोनों ने तो शयद कभी एकदूसरे से कोई एक्सेपटेसन भी नहीं रखा कभी”

अजय ने कहा “काश हमने एक दुसरे को समझा होता...काश एक दुसरे से पूछा होता कि हम चाहते क्या हैं?....काश श्रेयश के बारे में सोचा होता।......काश”

रजनी के चेहेरे पर सख्त भाव थे “अजय जिन्दगी के इस आखरी मुकाम पर हम दोनों एक दुसरे का सहारा बन सकते हैं, लेकिन नहीं।...ना तुम मुझे सहारा दोगे ना मैं तुम्हे...ये ही सजा है हमारी”

जय ने भी सख्ती से कहा “हाँ प्रायश्चित तो हम कर भी नही सकते...अब हम दोनों को जीना है इस “काश” के साथ”


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