एक साहित्यकार की मौत

एक साहित्यकार की मौत

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सीता आज डायरी और पेंसिल ले बैठ गई कि अब से मुझे भी कुछ लिखते रहना है पर ना जाने क्यों, वह जैसे ही लिखना शुरू करती कि पेंसिल की नोंक टूट जाती....और सुनाई देती पति 'रवि' की वो आवाजें, "नहीं, नहीं तुम कभी ना कलम उठाना, अनर्थ हो जाएगा। मैं जानता हूँ कि तुम जो लिखोगी वही साहित्य होगा...(समाज के हित में...) तुम्हारी लेखनी लोगों की आँखें खोलने जैसी होगी...फिर भी हाथ जोड़कर विनती यही कि कभी कुछ ना लिखना। मैं साहित्यकार तो हूँ परन्तु नाटकीयता लिखता हूँ पर तुम यथार्थ तो तुम्हीं में छिपा है।"

रवि, सीता के पति, अपने समय के नामचीन साहित्यकार रहे। रवि की संगति ने एक साधारण से पढ़ी-लिखी स्त्री को भी साहित्यकार बना दिया था। समाज के अच्छे-बुरे पहलुओं को देखना-परखना और उसके अनुरूप साहित्य को उससे जोड़ना सीता ने भली-भांति सीख लिया था।आखिर क्यों ना होता, बीते जीवन के इतने सारे अनुभव जो संग थे। रवि भी अपनी पत्नी की इन विशेषताओं को भली-भांति समझते थे। इन दोनों के प्यार और टकराव का कारण उनमें छुपी विद्वता थी। इनके बीच होने वाले तकरारों के फलस्वरूप बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य भी यही सोचते कि इन दोनों के मध्य कोई प्यार-व्यार वाली बात ही नहीं।

जबकि रवि को इस बात की जानकारी थी। उसने अपनी बेटी के विवाह में एक सीख, उसे अपने आशीर्वाद के रूप में दी थी। रवि ने कहा था, "बेटा ध्यान रखना पुरुष हमेशा अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते हैं परन्तु सत्य तो यह भी है कि पुरुष झूठे अहं को भी जीता है, इस कारण कई बार ऐसा भी होता है कि पत्नी की कही कोई सही बात भी पति के झूठे अहं को ठेस पहुंचा जाती है और यही कारण होता है तकरार का।

बेटी मैं जानता हूँ कि तुम्हारी माँ हमेशा सही होती है परन्तु कुछ सही बातें भी मेरे पुरुषत्व के अहं को ठेस पहुंचा जाती है जिसे मैं तत्काल संभाल नहीं पाता। बेटी यदि तुम्हारे जीवन में भी कभी ऐसा हो तो तुम ही ऐसे समय चुप हो जाना।

परिवार बनाना इतना आसान भी नहीं और इतना मुश्किल भी नहीं। ठीक इसी प्रकार किसी का प्यार बनना और प्यार पा जाना इतना सहज भी नहीं और इतना कठिन भी नहीं..."

75 वर्ष की सीता अपने जीवन में कितनी ही टूटी कड़ियों को जोड़ती आ रही थी। बचपन, जहाँ पिता घर छोड़ गये, पति जो कभी भोगी और कभी जोगी बन हिमालय की ओर प्रस्थान करने की बातें करता। अब तक सीता ने असुरक्षित बचपन ही देखा था और अब धमकी भरा असुरक्षित गृहस्थ जीवन का बोझ...! बच्चों को सँवारने में ना जाने कब वह खुद् को भूल चुकी थी।

फिर बच्चों के विवाहों की तैयारियों में जुट गई। पति के कमजोर कंधों का सहारा बन उसने कितने ही संघर्षों में जीवन बिताए थे। ऐसे में, बेटे के विवाह से कुछ दिन पूर्व पति का वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश की घोषणा कर जाना, सीता के लिये एक वज्रपात से कम ना रहा। उसने तो सपने में भी ऐसा कभी सोचा ना था....ख़ैर, समय के साथ पति के इस प्रतिज्ञा का पालन भी सखा भाव से करना सीख गई। यह प्रतिज्ञा सीता ने रवि के अंतिम क्षणों तक निभाया।

फिर वो दिन भी आया कि रवि समय के साथ काफी बीमार रहने लगे। बीमारी की हालत ने उन्हें कमजोर कर दिया था। ऐसे रवि को लगने लगा कि शायद सीता अब उन्हें अकेले संभाल ना पाए और दूसरा यह कि अब उन्हें अपने बच्चों के मोह ने घेर लिया था। सीता इस बात को समझती थी परन्तु वह अपने बेटे-बहू की अपनी माँ से नाराजगी को भी जानती थी। ऐसे में समय रहते उसने पति रवि की (बेटे-बहु संग रहने की) चाह को भी पूरा किया। रवि को संतान के सुपुर्द कर सीता अकेली अपने घर को लौट आई थी, इस सोच से कि औलाद माँ के लिये चाहे कुछ भी सोचे, वह कुमाता नहीं हो सकती।

ऐसा वह किसी भी कीमत पर होने नहीं दे सकती कि बच्चे माँ को गलत समझें। उसके लिये चाहे उसे कैसा भी त्याग ही क्यों ना करना पड़े। यही इन्हीं बातों को सोचते सीता ने ना जाने कितने ही दिन और रात अपनी खुली आँखों से ही बिता लिये। साथ ही वह यह भी सोच रही थी कि शायद बच्चे माँ की अनुपस्थिति में अपने पिता को अच्छी तरह संभाल रहे होंगे। वह यह सोच ही नहीं पाई थी कि आजकल बूढ़ों के पास बैठने के लिये समय ही किसके पास है !

पति के बहुत जिद करने पर सीता जब रवि के पास गई तो वह निष्प्राण सी हो गई। पति तो जैसे मृत्युशैया पर लेटे अपनी सीता का आस लगाए हुए थे। सीता ने अब तक तय कर लिया था कि वो अब चुप ना बैठेगी। अब तक जीवन ने उसे निडर बना दिया था। उसके अंदर का आत्मबल जग चुका था।

वह समाज और संतान दोनों से लड़ने को तैयार थी और पति में एक विश्वास दिलाने की कोशिश भी करने लगी थी कि वह जब तक साथ है उनको कुछ भी ना होगा...पर यह सब आखिर कितने दिनों तक तक चलता...

जिस सीता ने अपने जीवन को पाँवो-पाँवो चला आज फिर से वह अकेली थी, परन्तु उसके संग वो अपूर्व आत्मशक्ति थी जिसके सहारे वह अकेली ही जीना चाहती थी।

मन ही मन वह सोच रही थी कि पति से यह कैसी प्रतिज्ञा...कलम ना उठाने की...और लेखनी भी ऐसी की पति के प्रतिज्ञा पर कायम...

सीता अपनी जगह से उठ बालकोनी में लंबी साँस लेते हुई खड़ी हो गई। सामने से एक साधू बाबा इकतारा पर तान छेड़ते हुए जा रहा था_"करम की गति न्यारी-न्यारी संतो..."

आज भी सीता यह सोच नहीं पा रही कि वह आखिर किसका साथ दे...पति की प्रतिज्ञा का या फिर पति के बताए हुई 'साहित्य' की परिभाषा पर_"साहित्य यानि समाज के हित में लिखना"

सीता आज भी डायरी-कलम हाथ में रखे द्वंद को जिये जा रही है।


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