STORYMIRROR

मिली साहा

Romance

4  

मिली साहा

Romance

इबारत-ए-इश्क

इबारत-ए-इश्क

1 min
509

हम लिखते रहे इबारत-ए-इश्क अपने आंँसुओं से,

पर वो पल पल हमें देते गए दर्द-ए-इश्क लफ्जों से,


इंतेहा-ए-इश्क यूंँ कि बेवफ़ा से वफ़ा करते रहे हम,

उनकी उस नफ़रत में भी मोहब्बत निभाते रहे हम,


है बहुत मुश्किल वफ़ा-ए-मोहब्बत की राह चलना,

अपनों से मिले ज़ख्मों पर खुद ही मरहम लगाना,


काश कि पढ़ पाते हम तकदीर पर लिखी इबारत,

तो ढ़हती नहीं ऐसे किसी के मोहब्बत की इमारत,


पर नसीब हमारा एक तरफा इश्क़ की ये कहानी,

बेवफाई को ही हमने माना मोहब्बत की निशानी,


माना उसके बगैर यह जिंदगानी हमारी है अधूरी,

पर उन्हें पाना जिद नहीं वो तो चाहत थी हमारी,


मयस्सर हो उन्हें तमाम खुशियांँ यही दुआ करते,

हम तो चाहकर भी उनसे नफ़रत नहीं कर सकते,


वो लौट आए जिंदगी में तो समझो नसीब हमारा,

वरना जीने के लिए तो है उनकी यादों का सहारा,


अजनबी लगती अपनी ही पहचान अपना शहर,

अब तो बस इंतजार कब हो इख़्तिताम-ए-सफ़र,


इतनी कमज़ोर होगी असास हमारी मोहब्बत की,

सोचा न कभी ऐसी सजा मिलेगी इस इबादत की।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance