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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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मतिभ्रम

मतिभ्रम

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आजकल जग में लोगों को हो रहा बड़ा ही मतिभ्रम है

खुद गलती करके दूसरों पर डाल रहे बड़े-बड़े बम है


ऐसा उनका हाल है, बनाते लोग बड़े मकड़ जाल है,

लोगों को रुलाकर, चलते सदा वो लोग टेढ़ी चाल है


लोगों को फंसाना, फिर अपनी सहानुभूति को जताना,

पीछे से उनका जीना करते वो लोग बड़ा ही मुहाल है


ये लोगों की भावनाओं से खेल, तोड़ रहे हृदय अनुपम है

आजकल जग में लोगों को हो रहा बड़ा ही मतिभ्रम है


सामने से दिखाते आईना, पीछे से काम करते मनमाना,

लोगों को रोशनी दिखा, अंधेरे के देते चिराग़ ए करम है


खुद है वो पागल, लोगों को कर है, तू है साखी पागल

आंखों में ख़ुद सूरमा लगाते, फिर कहते तू चोर बेशर्म है


आजकल जग में लोगों को हो रहा बड़ा ही मतिभ्रम है

अपनी गलती दूसरों पे डाल खुद को समझते स्वर्ण भस्म है



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