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Rajeev Rawat

Romance


4.8  

Rajeev Rawat

Romance


ये इश्क नहीं आसां-कहानी

ये इश्क नहीं आसां-कहानी

14 mins 153 14 mins 153


           मै आज भी पंचमढ़ी जाता हूं या पचमढ़ी जाने की तैयारी करता हूं, न जाने क्यों मेरी और खासकर मेरी पत्नी की आंखें, किसी अनजाने व्यक्ति के लिये, जिससे हमारा कोई संबध नहीं था लेकिन इतना अपना हो गया था कि न चाहते हुए भी आंखें भर आती हैं।


      बरसों गुजर गये, न तो वह व्यक्ति रहा और न ही उसकी यादों स्मृति चिन्ह, समय के साथ उसकी कहानी भी समय के गर्त में डूबगयी। मेरी और नंदिता की मुलाक़ात एक पारस्परिक मित्र की शादी में हुई थी। वह जितनी सुंदरता की प्रतिमूर्ति थी उतनी ही चंचल।


       सारी शादी के कार्यक्रमों में उसका आगे आगे आकर दौड़ भाग करते देख, उसकी एक प्यारी चंचल छवि मेरे दिल में बस गयी थी।मैने अपनी मम्मी को हल्का सा इशारा कर दिया था और मम्मी बर्षों से इसी पल के इंतजार में थी। उन्होंने मौके को दोनों हाथों से लपक लिया और शादी के कार्यक्रम के बाद नंदिता के मम्मी-पापा के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया।


      मैने एम बी ए करने के बाद अपना फैमली बिजनेस संभाल लिया था। वह वापस जा रही थी, मैं और मम्मी भी उसे छोड़ने रेलवे स्टेशन पर आये थे, अभी तक उन लोगों हां या नहीं कहा था। बस यही कहा था कि उन्हें कोई इतराज नहीं लेकिन नंदिता से यहां से जानेके बाद बात करके सूचित करेंगे। 


  ट्रेन चलने को हुई, हम लोग प्लेटफॉर्म पर खड़े हाथ हिला रहे थे तभी दरवाजे पर नंदिता दिखी और उसके हाथ से एक रूमाल छूटकर मेरे मुंह पर आकर चिपक गया, जब मैने रूमाल को हाथ में लेकर देखा, नंदिता हाथ हिलाते हुए दरवाजे पर खड़ी मुस्करा रही थी। यानि हां का सिग्नल देकर वह चली गयी।


       हमारी शादी की बात शुरू हो गयी, मैने हनीमून पर यूरोप टूर पर जाने का निश्चय कर नंदिता को बता दिया, वह बहुत खुश थी।अपनी सारी फ्रेंड् को बता दिया।शादी के बाद यूरोप जाने के लिए हमारी तैयारी हो गयी थी और उसी समय मां बीमार हो गयी, उन्हें क्रिश्चियन हास्पिटल में भर्ती कराना पड़ा, पता चला कि अचानक ब्लडप्रेशर बढ़ जाने के कारण ब्रेन हेमरेज हो गया। डाक्टरों ने आई सी यू में भर्ती कर दिया और स्पष्ट बता दिया कि उम्र को देखते हुए आप्रेशन बहुत रिस्की है, अब मेडिसिन से ही ब्लड क्लोटिंग को ठीक करने की कोशिश की जायेगी। 

      

       पन्द्रह दिन बाद मां रिकवर कर पायीं लेकिन हमारा यूरोप जाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया। मां ठीक होकर घर पर आ गयी थी, नंदिता ने दिल लगा कर उनकी सेवा की, मां नंदिता से बहुत खुश थीं। एक दिन शाम को उन्होंने अपने कमरे में मुझे और नंदिता को बुलाया और बोली--


--मेरी बीमारी कारण तुम दोनों का हनीमून का कार्यक्रम कैंसिल हो गया।


नंदिता ने मां के दोनों हाथ थाम कर कहा--


--कोई बात नहीं मां, अगर हम लोग चले गये होते और तब ऐसा कूछ हो जाता तो बाबूजी कैसे घर, आफिस और होस्पिटल संभालते। 


मां ने उसके गालों को अपने हाथों में लेकर पेशानी पर एक चुबंन जड़ दिया और बोली--


--तीन दिन बाद अंकित का जन्म दिन है, इसलिये एक छोटी सी गिफ्ट मेरी तरफ से, और फिर बाबूजी की ओर इशारा किया, बाबूजी ने एक लिफाफा उनकी ओर बढा़ दिया। 


दोनों चौक गये। लिफाफा खोलकर देखा, उसमें पचमढ़ी के होटल की बुकिंग थी, वह भी पूरे सात दिनों की। 


--तुम लोग भोपाल से पचमढ़ी कार से जा रहे हो, मैने ड्राइवर से बोल दिया है। 


नंदिता ने मेरी और तिरछी नजर से देखते हुए मां के गले में बाहें डाल दी। 


मैनें कहा कि--बाबा , ड्राइवर की क्या आवश्यकता है, मैं और नंदिता दोनो ड्राइव कर लेगें। 


पापा कुछ बोल पाते मां ने इशारे से उन्हें मना कर दिया। मम्मी समझ थी। 


       भोपाल(म0प्र0) से लगभग से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर होशंगाबाद जिले में स्थित सतपुड़ा रेंज का खूबसूरत हिल स्टेशनहै। कहते हैं कि पंच(पांच) और मढ़ी (गुफायें) जो पहाड़ी पर स्थित हैं और जो पांडवों ने अपने निर्वासन के समय बनायी थीं। हम लोग सुबह सुबह ही घर से निकल गये। 


         भोपाल पार करते ही नंदिता बहुत खुश नजर आ रही थी, मेरे कांधे पर अपना सर टेकती हुई बोली--


--सच में मां कितनी अच्छी हैं। 


मैने उसे तंग करते हुए बोला--और मैं? 


उसने मेरी बांह में चिकोटी काटते हुए कहा- -


- सबसे नाॅटी बाॅय--और खिलखिला कर हंस पड़ी। 


मैने गौर से उसकी ओर देखा, शादि के तुरंत बाद जिम्मेदारियों के बोझ तले उसकी चंचलता कहीं दब गयी थी, जो इन एकांत क्षणों में पुनः जागृत हो गयी। मैंने उसके चैहरे पर छेड़खानी करती हुई लट को एक हाथ से ऊपर कर दिया।


             लगभग 80 किलोमीटर के बाद होशंगाबाद आ रहा था, थोड़ी सी थकान मिटाने के लिये रोड के किनारे बने ढाबे पर कार रोक दी। सच में कभी कभी ढावे की चाय बहुत स्वादिष्ट लगती है। मैं मुंह धो रहा था कि नंदिता स्पेशल चाय का आडर देकर आगयी। चाय वाला कार में ही लेकर आ गया, देखा एक ही ग्लास चाय थी, मैंने प्रश्न सूचक दृष्टि से नंदिता की ओर देखा तो वह मुस्करा दी और बोली--


-हम एक साथ एक ग्लास में ही चाय पीयेगे, हमारे यहाँ कहते हैं कि जूठा पीने से प्यार बढ़ता है।


       उसकी पुरानी शरारत के साथ मेरी वह नटखट नंदिता वापस आ गयी, मैने कार में अपनी ओर खीच लिया और उसके गालों पर एक चुंबन अंकित कर दिया और उसने मेरे गले में अपनी बाहें डाल दी। 


            होशंगाबाद से नंदिता ने ड्राइव शुरू की और पिपरिया तक उसने ड्राइविंग की। इस बीच मैं उसकी गोद में सर रख करआराम से लेट गया। पिपरिया से मैने ड्राइविंग शुरू की। 


            पचमढ़ी सतपुड़ा रेंज मे 1067

मीटर की ऊचाईं पर स्थित है,। हम लोग 4.00 बजते बजते वहां पहुंच गये थे, वहां पर प्राकृतिक संपदा चारों ओर फैली हुई,हल्का हल्का गुलाबी ठंड का मौसम हो गया था। हम लोग अपने होटल में आ गये। पलंग पर थकान मिटाने के बाद थोड़ी देर बाद गाइड ने डोर वैलबजाई, तब तक हम तैयार हो गये थे।


            गाइड ने बताया हम लोग धूपगढ़ चलेगें, वह सतपुड़ा रेंज की सबसे ऊंची चोटी है जो लगभग1352 मीटर ऊचाई पर स्थित पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व का एक हिस्सा है। रास्ते में पहाड़ी पर चढ़ने के लिये बहुत खतरनाक चढाई थी, बार बार नंदिता डर कर मेरी बाहों को पकड़ कर अपनी आंखें बंद करके मेरे सीने पर सर रख देती थी। ऐसा लग रहा था काश यह ऊचाईं खत्म न हो और नंदिता ऐसे ही लिपटी रहे। 


      ठंडी हवा के झोंके ऊंचे पत्थरों और पेड़ों से टकरा कर हमें उद्देलित कर रहे थे। गाइड सोनू ने हमारा ध्यान डर से भटकाने के लिए बताया कि अंग्रेजों के समय सूबेदार नाथूराम जी पवाॅर और ब्रिटिस सेना के कप्तान जेम्स फोर्सिथ 1857 में पचमढ़ी पहाड़ियों खोज कीथी।


         धूपगढ़ आ गया था, इसको सनसेट और सनराइज पांइट भी बोलते हैं, बहुत भीड़ थी। सभी अपने अपने साथियों और जीवन साथियों के साथ आये थे। बस सूरज के डूबने के इंतजार में सभी सीढ़ियों पर बैठ गये थे। 

            

नंदिता और मैं एक दूसरे का हाथ थामें ठंडी बहती हुई हवाओं में मीठी मीठी सिहरन महसूस करते हुए टायटैनिक पोज में फोटो खिचवा रहे थे, तभी नंदिता की नजर एक फटे पुराने कपड़े पहने, बढ़ी हुई दाढ़ी, अस्त व्यस्त व्यक्ति पर पड़ी जो चुपचाप एक कोने में बैठा आकाश में डूबते सूरज को देखने के लिये बैठा था। 


         थोड़ी देर में सामने वाली पहाड़ी पर लाल रंग की चूनर ओढ़े सूरज अपने घर जाने की तैयारी कर रहा था। सभी कपल हाथों से दिल का चिन्ह बनाये , जिसके बीच में वह डूबता हुआ सूरज था, कुछ इस पोज में थे जैसे सूरज उनकी हथेली में आ गया हो। हम भी तरह तरह के पोज देकर फोटो खिचां रहे थे। सच में कमाल की जगह है, हम बेकार में बाहर के देशों में जाते हैं जबकि यहां तो उससे अच्छी जगहें हैं।


           नंदिता ने उस पागल से व्यक्ति की ओर इशारा किया जो चुपचाप डूबते हुए सूरज को एकटक देख रहा था और आंखो में आंसु छलक रहे थे। धीरे धीरे सभी लोग सूरज डूबने के बाद नीचे जा रहे थे लेकिन वह अब भी वहीं खड़ा था, ठंड और दुनिया से बेपरवाह।नंदिता ने गाइड से पूंछा तो उसने बताया कि--


--साहब मुझे उसके बारे में कुछ ज्यादा जानकारी नहीं है, वह यही कोई पांच साल पहले यहां पर अपनी के पत्नी के साथ आया था।अपनी पत्नी को वह बहुत प्यार करता था,सुनने में आया था कि दोनों ने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी। लड़की के घर वाले इसके लिए तैयार नहीं थे।इसी पत्थर पर बैठ कर दोनों हाथों में हाथ डाले जीवन के सपने बुनते थे। 



          शादी के बाद दोनों हनीमून के लिये यहां पर आये थे। लड़की जिसका नाम सोमा था, ने एक दिन अपने घरवालों को सूचना दे दी कि उसने और रवि ने शादी कर ली और हम खुश हैं, हमें न खोजा जाये। तब लड़की वालों ने प्यार से पूंछा कि वह कहां है, लड़की समझी कि शायद घर वालों ने माफ कर दिया और बता दिया कि पचमढ़ी में हैं।


          एक दिन लड़की वाले आ गये, यह रवि बाजार में सामान खरीद रहा था, सोमा होटल में थी। घर वालों ने रवि को पहचान लिया और उसे मारने दौड़े, रवि जान बचाकर भागा और पहाड़ी से फिसल गया। घरवालों ने उसे मरा समझकर होटल गये और सोमा को साथ ले जाने की तैयारी कर रहे थे, उन्होंने बता दिया कि रवि पहाड़ी से गिर कर मर गया है लेकिन सोमा ने इंकार कर दिया और होटल से भाग गयी। 


  वह पहाड़ियों में छिप गयी, बहुत खोजने पर नहीं मिली। तीन चार दिनों बाद रवि को हरवाहों ने पहाड़ी पर बेहोश पाया और अस्पताल में भर्ती करा दिया। रवि को होश आया तो पूरी पचमढी़ में, जंगलों में सोमा - - सोमा पुकारता घूमता रहता था, तब किसी ने बताया कि आखिरी बार इसी पांइट पर सोमा को देखा गया था।


         तब से रवि रोज पैदल आता है और सूरज की उगती रोशनी से ढलती सांझ तक ऐसे ही सोमा का इंतजार करता रहता है।किसी ने कुछ दे दिया तो खा लिया, नहीं तो भूखा प्यासा पड़ा रहता है और किसी के दिये कपड़े ओढ़कर कहीं भी पड़ा रहता है।


       नदिंता उस के पास पहुचीं और हाथ लिए बिस्किट के पैकेट और पानी की बोतल को उसकी ओर बढ़ा दिया, उसने सूनी नजरोंसे उसकी ओर देखा और बोला-


-बहिन, देखना एक दिन उस सूरज की डोली से उतर कर मेरी सोमा आयेगी और मुझे साथ ले जायेगी।


पता नहीं उस बहिन शब्द में कुछ था या उसकी बेबस आंखों में नंदिता ने उसके कांधे पर हाथ रख कर कहा--


--हां भैया वह जरूर वापस आयेगी।


वह खुश होकर जैसे देख रहा था, एक पल चुप रह कर बोला-


--बहिन तुम बहुत अच्छी हो, मैं कहता था कि मेरी सोमा आयेगी लेकिन तुम्हारे अलावा किसी ने नहीं कहा कि वह आयेगी, सब मुझे पागल कहते हैं। मैं पागल हूं या यह दुनिया?


उस असीम प्यार करने वाले को देखकर मेरे अंदर भी कुछ होने लगा था। अचानक नंदिता बोली -


- भैया, हमारे साथ तुम नीचे चलोगे? 


वह उठ गया, रास्ते में गाइड ने बताया कि पहली बार किसी की बात मानते देखा है। नीचे आते आते अंधेरा हो गया था, नंदिता उसे दुकान पर ले गयी और कपड़े तथा कंबल दिला दिया। साथ ही अपने साथ एक होटल में खाना खिला दिया। खाना खाने के बाद उसने कपड़े लिए और कंबल ओढ कर वहीं गैलरी में सो गया।  


          हम दोनों काफी समय तक उसकी बातें करते रहे। सुबह हमें जटाशंकर गुफाओं के दर्शन के लिए जाना था। सुबह नहा कर तैयार होकर बाहर आये तो देखा वह रवि गायब था। हमारा मन ना जाने क्यों बुझ सा गया। 


             गाइड आ गया था। हम लोग जटाशंकर दर्शन के लिये चल दिये। बहुत खतरनाक सीढ़ियां थी, नदिंता और मैं एकदूसरे को सहारा देते हुए नीचे उतर रहे थे। एक एक कदम संभाल कर रखते हुए नीचे पहुंचे, पत्थर का कटाव ऐसा था मानों शेषनाग का फन हो और नीचे बहते हुए पवित्र पानी के साथ शिवलिंग के भव्य दर्शन हुए, कहा जाता है की भगवान शिव ने राक्षस भस्मासुर से खुद को बचाने के लिए इन गुफाओं में शरण ली थी। 


        इन गुफाओं के अंदर, एक शिवलिंग है जो स्वाभाविक रूप से गठित होता है और इस गुफा का आकार में सांप देवता शेषनागके आकार का है जिसका हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णन एक खगोलीय हजार मुंह वाले सांप के जैसा है। यह गुफा पचमढ़ी में देखने केलिए प्रसिद्ध स्थानों में से एक है। 


हम दोनों पूजा के बाद धीरे धीरे अपनी आंखे खोली तो नंदिता मंद मंद मुस्करा रही थी। 



मैने पूंछा - - तुम इतनी देर से आंख बंद कर के क्या मांग रही थी? 


उसने एक बार शिवलिंग की ओर देखा और बोली-


- - आप भी तो कुछ मांग रहे थे। अगला जन्म के लिये कोई अच्छी लड़की मांग रहे थे न? 


उसकी आंखें चंचल होकर मेरे चैहरे पर टिक गयीं थी।


मैने कहा - - एक काम करते हैं कि हमने जो मांगा, वह कागज पर लिखकर भगवान के पास रखते हैं और एक दूसरे की परची उठाकरदेखेगें कि क्या मांगा। 


       उसने हां में सर हिला दिया। हम दोनों ने पर्ची लिखकर पंडित जी को दे दीं, उन्होंने भगवान को छुलाकर मेरी परची नंदिता कोऔर नंदिता की परची मुझे दे दी। हम दोनों ने परची खोली तो दोनों खिलखिला कर हंस पड़े और भगवान को प्रणाम करके हांफते हुए ऊपर आ गये। 


       नंदिता की परची में लिखा था कि - हे भगवान, अंकित को मेरा हर जन्म में पति बनाना और मेरी परची में लिखा था--हे प्रभू, जो कुछ नंदिता मांगे वह पूरा कर देना। 


         नास्ता करने के बाद अगला पड़ाव पांडव गुफाएं थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब पांडव निर्वासित हुए तो ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने इन गुफाओं के अंदर आश्रय लिया था। पहली शताब्दी के दौरान बौद्ध भिक्षुओं ने भी इन गुफाओं में आश्रय लिया था।तब से, इन गुफाओं ने हिंदुओं और बौद्धों के लिए धार्मिक महत्व ले लिया है। बहुत पुरानी पत्थरों को काट कर पहाड़ी बनाई मजबूत गुफाएं थीं। हम दोनों हाथों में हाथ लिए घूमते और यादों के लिए फोटो खींचते रहे। 


          इसके बाद हम दोनों बी फाल जो प्राकृतिक झरना है और इसका पानी मीठा है, यहाँ पर ठंडे पानी में नहाने का आनंद उठानेके लिये नंदिता मना कर रही थी लेकिन मैं उसे अपनी गोदी में उठा कर ले गया और वह बच्चों जैसी डर के कारण मुझ से चिपकी रही, हलांकि वहां नहा रहे छोटे बच्चों को नंदिता के डर पर मजा आ रहा था। 

           वहाँ से अगले दिनों हांडी खोह, महादेव हिल्स और डच फाल्स, सतपुडा राष्ट्रीय उद्यान भी देखने गये, शायद जीवन के यहपल हमारे जिंदगी की वह निधि थे जो निश्छल, निष्कपट और अप्रितम प्यार के लिए हमारी मोहब्बत की डायरी में हमेशा हमेशा के लिएअंकित हो गये थे लेकिन न जाने क्यों उस प्रेमी रवि को नहीं भूल पा रहे थे। खास कर नंदिता तो उसे भाई ही मान बैठी थी।


         अभी हमें तीन दिन और यहां रहना था। इसलिये नंदिता के कहने पर हम लोग सुबह सुबह सनराइज देखने के लिये धूपगढ़ की ओर चले गये, उस कड़कती ठंड में बहुत कम लोग ऊपर पहुंचे थे लेकिन वह रवि आज भी कंबल ओढे सूरज को देख रहा था नंदिनी खाना पैक करा कर उसके लिए लायी थी, उसको दिया और बोली - - 


--भैया, तुम नीचे से आ क्यों गये थे? 


वह जोर से हंस पड़ा और धीरे से बोला-


-बहिन, तुम समझती नहीं हो, सोमा उस सामने वाली पहाड़ी तक रोज सूरज के घोड़े पर बैठ कर आती है और शाम को वहीं चली जातीं है, अगर मुझे न देखती तो उसे दुख होता न, देखो, उधर देखो


उस लाल सूरज में मेरी सोमा की शक्ल तुमको भी नजर आयेगी और एक दिन उसे मेरे पास भी तो आना हैऔर हमेशा हमेशा हमें साथ रहना है। 


      सूरज उग रहा था, लालिमा चारों और छायी थी और ऐसा लग रहा था जैसे देव स्वरुप भगवान के दर्शन हो रहे हों। हम लोगों ने बहुत कोशिश की वह हमारे साथ चले लेकिन वह नहीं आया। वह यही कहता रहा - -


-- बहिन मैं एक दिन सोमा को साथ लेकर आऊंगा। तुम भी मेरी तरह उस पहाड़ी की ओर देख कर आवाज लगाओ--सोमा - - सोमा--


हम लोग पचमढ़ी से वापस आ गये। रास्ते में नंदिता उदास और चुपचाप थी, मैने कारण पूंछा तो वह बोली--


--क्या तुम भी रवि की तरह मुझे प्यार करते हो? 


         मैंने एक पल उसकी और देखा और अपनी ओर खीचंते हुए कहा कि एक शर्त पर तुम मुझे छोड़कर कभी नही जाओगी। वह छुई-मुई सी मुझ से लिपट गयी, उसकी आंखों में आंसू छलक गये थे पता नहीं अपने प्यार के लिए या उस अनजान भाई के प्यार के लिए।


         हम गाइड को रुपये देकर आये थे कि उसका खाने का इंतजाम करवा देना। एक दिन गाइड का फोन आया कि बादलों के कारण तीन चार दिनों से सूरज नहीं निकला तो वह पागलों की तरह बहुत रोता रहता था, न कुछ खाता और न पीता, बस यही कहता कि मेरी सोमा रूठ कर चली गयी, अब सूरज की डोली में बैठ कर मेरे पास नहीं आ रही, शायद मुझे ही जाना पड़ेगा, उसे लाने के लिये और एक दिन वह पहाड़ी की रैलिंग से नीचे कूंद गया, उसका कंबल रैलिंग में फंसा मिला था। 


           अब जब भी हम पचमढ़ी जाते हैं, घूपगढ़ से उगते और डूबते सूरज में सोमा-रवि के मुस्कराते चैहरे दिखते हैं और अमर प्रेमकी वह गाथा भले ही समय के गर्त में डूब गयी हो लेकिन आज भी खामोश पहाड़ी चट्टानों से और बी फाल्स के गिरते झरने से गूंजती हूई आवाज हवाओं में फैल कर आती है जैसे कोई पुकार रहा हो-


-सोमा--सोमा और उत्तर में दूसरी पहाड़ी से गूंजती है--रवि - रवि--और एक खामोशी सी छा जाती है तभी अनचाहे ही शायर जिगरमुरादाबादी का लिखा जेहन में आ जाता है-


ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे 

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है 

       


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