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Vijay Kumar Vishwakarma

Romance

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Vijay Kumar Vishwakarma

Romance

ये बात है

ये बात है

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स्कूूल की पढ़ाई पूरी करके अभय काॅलेज पहुँच चुका था मगर उसका दिल अभी भी स्कूल की उसी बेंच में धड़क रहा था जहाँ रूचि बैठती थी। काॅलेज में बहुत सुन्दर सुन्दर लड़कियाँ थीं और सभी से उसकी दोस्ती भी थी मगर रूचि की कमी वह हर पल महसूस करता। स्कूली पढ़ाई के बाद उसके पैरेंटस का जाने कहाँ ट्रांसफर हो गया।

अभय कभी कभी खुद की कमजोरी पर पछताता। चार साल साथ पढ़ने के बाद भी अभय कभी अपने दिल की बात रूचि को बता नही पाया। वह चुपके चुपके रूचि को ऐसे देखता कि उसे जरा भी खबर नही होने पाई।

वक्त गुजरा और काॅलेज की पढ़ाई भी पूरी हो गई। धीरे धीरे इंटरनेट का चलन बढ़ा और आनलाईन नौकरी की तलाश सहित सोशल मीडिया की नई विधा युवाओं में लोकप्रिय होने लगी। एक दिन अभय सोशल मीडिया में अपने पुराने दोस्तों को ढ़ूंढ़ रहा था और तभी उसे रूचि की प्रोफाईल दिखी। अभय को ऐसा महसूस हुआ जैसे समुद्र भर खजाना मिल गया हो। अभय की फ्रेंडलिस्ट में जुड़कर रूचि भी खुश थी। पुराने यादें ताजा होने लगी।

रूचि विद्यालयीन काल से ही कविताएँ लिख रही थी। स्कूल में उसे कई बार प्रथम और विशेष पुरस्कार भी मिला था। सोशल मीडिया में भी रूचि कई प्यारी प्यारी कविताएँ पोस्ट करती। अभय को जितनी रूचि, रूचि में थी उतनी कविताओं में नही थी मगर रूचि की लिखी कविताएँ उसे इसलिए पसंद आती क्योंकि उसमें रूचि की सोच, उसके विचार और उसकी भावनाएँ शामिल थी।

अभय ने गौर किया। कुछ दिनों से रूचि की कविताओं में श्रृंगार रस और प्रेम की अभिव्यक्ति हो रही थी। अभय का माथा ठनका। कहीं रूचि के जीवन में कोई बहार बनकर तो नही आ धमका। सोशल मीडिया से सम्पर्क में आने के बाद से ही वह अपने दिल की बात बताने की सोच रहा था मगर जाने क्यों उसकी भावनाएँ रूचि के सामने न मुहँ से निकल पाती न की-बोर्ड पर।

अभय उस अज्ञात तीसरे को पहचानने के लिए रूचि की फ्रेंडलिस्ट को कई बार देखा। उसमें कई स्मार्ट लड़के जुड़े थे। अभय सीधे रूचि से इस बारे में बात करने से हिचक रहा था। रूचि जब भी प्रेम से संबंधित कोई कविता पोस्ट करती, उसे ढ़ेर सारे लाईक और प्रशंसनीय कमेंट मिलते। अभय भी लाईक और कमेंट करता।

अभय का ध्यान नितिन नाम के शख्स पर गया। रूचि की प्रत्येक कविता पर नितिन की लाईक और तारीफों भरी कमेंट जरूर मिलती। अभय का दिल बैठने लगा। वह नितिन की प्रोफाईल पर क्लिक किया। नितिन की कई पोस्ट पर रूचि की लाईक और कमेंट मिले। अभय को महसूस हुआ, उसके सपाट प्रेम कोण में तीसरा कोण बन चुका है।

नितिन हैण्डसम था, उसकी प्रोफाईल फोटो बेहद आकर्षक थी। अभय खुद को आईने में देखता तो नितिन की तुलना में खुद को कमतर पाता। वह निराश रहने लगा। दिन बीतते गये।

एक दिन उसे एक पुरानी पत्रिका मिली जिसमें प्रेम पर आधारित शायरी एवं कविताएँ प्रकाशित थीं। अभय एक कविता चुना और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। पांच मिनट के अन्दर उसे रूचि की लाईक और कमेन्ट बाक्स में 'वाह' लिखा मिला। अभय को रूचि का ध्यान आकर्षित करने का मंत्र मिल गया। वह पुस्तक बाजार से कविताओं वाली पुरानी पत्रिकाएं खरीदकर उनमें से प्रेमपूर्ण कविता चुनता और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगा।

अभय तब हैरान रह गया, जब नितिन भी प्रेमभरी कविताएँ पोस्ट करने लगा। अभय को लगा कि उसका गुप्त मंत्र नितिन भी जान गया और उसकी तरह पुरानी कविताओं को अपनी प्रोफाईल से पोस्ट कर रूचि की वाहवाही लूट रहा है। वह ईर्ष्या से छटपटा उठा। उसका मन किया कि वह रूचि के सामने उसकी पोल खोल दे मगर ऐसे में उसकी पोल भी स्वतः खुल जाती, इसलिए वह मनमसोस कर रह गया।

अभय दूसरा रास्ता तलाशने लगा। एक दिन समाचार पत्र में उसने शहर के एक अधेड़ उम्र के कवि के नागरिक सम्मान की खबर पढ़ा तो उसे कुछ सूझा। वह उन कवि महोदय के घर आने जाने लगा और उनकी कविताओं की झूठ मूठ की वाह वाही कर उनका चहेता श्रोता बनने का प्रयास किया।

अभय उनसे घंटो कविता सुनता और बीच बीच में प्रेम और श्रृंगार की कविताओं को दो तीन बार सुनने का अनुरोध कुछ ऐसे करता जैसे उसे आनंद की अनुभूति हो रही हो। बार बार एक ही कविता सुनकर अभय उन्हें याद कर लेता और लौटते ही सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देता।

रूचि अभय की उन कविताओं पर रीझने लगी। वह अक्सर कविताओं के बारें में अभय से चैट करती। उसने अभय को अपने बर्थडे पर अपने घर मिलने बुलाया। अभय को लगा आखिर उसके प्यार की गाड़ी सही ट्रैक पर आ गई। अभय ट्रेन में रिजर्वेशन करा लिया। उसे अपनी पीठ पर पंख उगता महसूस होने लगा। वह उड़ने को बेताब नजर आ रहा था।

ट्रेन से रूचि के शहर पहुंच कर अभय एक होटल में ठहरा और नहा धोकर, अच्छी तरह से तैयार होकर शाम के वक्त रूचि के घर पहुंचा। रूचि के माता पिता ने उसके बर्थ डे पर एक छोटी सी पार्टी का इंतजाम किया था। रूचि अभय को अपने माँ और पिताजी से मिलवाई।

रूचि के द्वारा केक काटने के कुछ मिनट पहले ही एक युवक रूचि की पार्टी में शामिल हुआ। वह नितिन था। अभय नितिन को देखते ही पहचान गया। अभय थोड़ा असहज महसूस किया।

केक कटने के बाद सभी ताली बजाकर रूचि को जन्मदिन की शुभकामना दिये। इसी मौके के लिए अभय अपने शहर के उन कवि महोदय की एक शानदार कविता कागज पर लिखकर लाया था। वह जेब में हाथ डाला और कविता लिखे कागज को बाहर निकल कर खोला। उसकी नजर कविता की पहली लाईन पर गई -

'अनुभूति के सुर हैं, सांसो की सरगम।'

तभी उसके कान में वही लाईन सुनाई पड़ी। अभय स्तब्ध रह गया। अभय उस कागज से नजरें हटाकर इधर उधर देखा। वह नितिन था। नितिन हूबहू वही लाईनें पढ़ रहा था, जो उसके हाथों में पकड़े कागज पर लिखी थीं। ऐसा कैसे हो सकता है। यह असंभव था। मगर कविता पूरी होते ही पूरा हाॅल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अभय की आँखों से आँसू टपक पड़े।


रूचि आगे बढ़ी और नितिन का हाथ थाम ली। अपने बचपन के प्यार, इकलौती मोहब्बत को किसी और का होता देख अभय कांप गया। उसका मन कर रहा था कि वो वहीं दहाड़ मार कर रोये मगर उसने अपने मन को दबोच रखा था। नितिन का हाथ पकड़े रूचि उसी की ओर आ रही थी। अभय तुरंत हथेलियों के पिछले भाग से अपने आँखों के कोरों को पोंछा।

अभय के सामने पहुंचकर रूचि नितिन से बोली - "नितिन ये हैं मेरे बचपन के साथी .... स्कूल के सहपाठी और मेरे सबसे अच्छे दोस्त अभय .... और अभय .... ये हैं नितिन ... मेरे सोशल मीडिया के खास दोस्त .... तुम तो इन्हें जानते ही होगे ?"

अभय तुरंत नहीं में सिर हिलाया। रूचि बोली - "ये जाॅब दूसरे शहर में करते हैं ... लेकिन हैं तो उसी शहर के ... जहां तुम रहते हो।" अभय चौंक गया। वह नितिन का चेहरा गौर से देखा। उसे लगा कि उसने नितिन को कहीं देखा है सोशल मीडिया के अलावा लेकिन याद नही आ रहा।

अभय को उलझन में देखकर नितिन मुस्कुराते हुए हाथ आगे बढ़ाया और हैंडशेक करते हुए बोला - "मैं .... कवि ऋतुराज कुमार का बेटा हूँ।" 

अभय का चेहरा पीला पड़ गया। उन्हीं कवि महोदय की कविताओं के बूते वह रूचि के करीब आ पाया था। 'तो क्या नितिन को यह बात पता है ? कहीं कवि महोदय मेरी चालाकी को ताड़ तो नहीं गये थे कि मैं कविता सुनने का ढ़ोंग कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा हूँ।' तरह तरह के सवाल उसके दिमाग में कौंधने लगे।

अपने अंदर मचे द्वंद के बीच उसे रूचि के पिता उन तीनों की ओर निहारते हुए कुछ बोलते दिखे। अभय उनकी आवाज पर ध्यान लगाया। वे कह रहे थे - "आज के इस शुभ अवसर पर .... हम आपसे एक और खुशखबरी शेयर करना चाहते हैं ....।" उनका इशारा पाकर रूचि अपने पिता के पास पहुंच गई।

रूचि का हाथ पकड़कर उसके पिता ने कहा - "हम अपनी लाड़ली रूचि का हाथ .... विवाह के लिए इसके प्रिय दोस्त को सौंपना चाहते हैं .... इधर आओ बेटे।" उन्होने अभय के पास खड़े नितिन की ओर इशारा किया। अभय मायूस होकर सिर झुका लिया।

कुछ ही पल बीते होंगे कि तभी नितिन अभय का हाथ पकड़ कर रूचि की तरफ बढ़ा। अभय हैरानी से नितिन की ओर देखा। नितिन अभय का हाथ रूचि के पिता को थमाया। मुस्कुराते हुए रूचि के पिता बोले - "और ये रहे .... रूचि के प्रिय दोस्त ... अभय।" 

सभी ने तालियाँ बजाकर खुशी जाहिर किया। उनमें नितिन भी था। अभय को अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था। उसे वह सब सपना लग रहा था। उसकी आँखें पुनः नम हो गईं, मगर इस बार उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे।

रूचि अभय के कानों में धीरे से बोली - "तुम्हारी चाहत तो मैं बचपन में ही जान गई थी ..... लेकिन तुम थे जो छुपे रूस्तम बनने पर आमदा थे।" 

"मैने कुछ और भी छुपाया है।" - अभय शर्मिंदगी के साथ अपनी मुठ्ठियों में कैद कविता लिखे उस कागज को दिखाते हुए बोला - "मुझे कविता नहीं आती रूचि ... मैं औरों की कविता चुराकर तुम्हें इम्प्रेस कर रहा था।"

रूचि अचानक से संजीदा होकर अभय को एकटक देखने लगी और फिर खिलखिलाकर हंस पड़ी। रूचि नितिन को पास बुलाकर वह कागज थमाते हुए अभय की कही बात दोहराई। नितिन भी हंस पड़ा। अभय उन दोनो के चेहरों को कौतूहल के साथ देख रहा था।

रूचि बोली - "पता है ... मेरे बनावटी कविराज .... तुम्हारी पोस्ट की हुई किसी पुरानी पत्रिका में छपी कविता को पढ़कर ही तुम्हारी पोल खुल गई थी .... फिर नितिन ने भी वैसा ही किया ..... जब तुम इनके पिता की कविता पोस्ट किये ... तो नितिन उसे पढ़ते ही पहचान गया .... फिर हम दोनो ने तय किया कि ... देखे आप और क्या क्या गुल खिलाते हैं ?"

अभय का चेहरा हैरत और शर्मिंदगी से गुलाबी हो गया। फिर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट लौट आई, वह बोला - "तो ये बात है ?"

रूचि और नितिन एक साथ बोले - "हाँ ये बात है।" तीनों खिलखिलाकर हंस पड़े।


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