vijay laxmi Bhatt Sharma

Drama


4.5  

vijay laxmi Bhatt Sharma

Drama


यात्रा

यात्रा

14 mins 661 14 mins 661

उसने आँख खोली तो सुबह हो गई थी। हल्की हल्की रौशनी पर्दे से झाँक रही थी। वो हड़बड़ाकर उठी ओह आज काफ़ी देर हो गई अपने आप मे ही बुदबुदाई। उसने पलंग से उतरते हुए ही अपने बालों को गोलमोल कर बेतरकीब ही पीछे जूड़ा बनाया। अपनी दोनो हथेलियों को आपस में घर्षण कर आँखों से लगा फिर उन्हें गौर से देखा। थोड़ा मुस्कुराई फिर चल दी यात्रा की ओर ।

   सोचने लगी स्त्री की यात्रा ही तो है रोज की दिनचर्या जो एक बार शुरू होती है तो फिर रात तक निरंतर चलती रहती है। थकान होते हुए भी चेहरे पर एक मुस्कान रखनी पढ़ती है की कहीं अपने नाराज़ ना हो जाएँ और फिर ये कभी ना ख़त्म होने वाली यात्रा निरन्तर चलती रहती है। सर्दी गर्मी बरसात वसंत सभी ऋतुएँ अपने अपने समय पर आ अपना प्रभाव दिखा चली जाती हैं परन्तु स्त्री जिसकी कोई समय सीमा नहीं। कोई काल नहीं। उसे तो बस निरन्तर चलना है जैसे कुछ कार्य उसके ही नाम हैं।

   सोचते सोचते उसकी निगाह चारों ओर गई सब सो रहे थे कारोना वैश्विक महामारी के चलते स्कूल कॉलेज , ऑफ़िस सभी बंद थे। पूरी तरह से लॉक्डाउन था।

सरकारी ऑफ़िस होने की वजह से मुझे कभी कभी बीच में कुछ घंटो के लिए ऑफ़िस जाना पड़ रहा था वर्ना घर पर सबकी सम्पूर्ण छुट्टी थी। उसने सोचा सबके लिये लॉक्डाउन यानी आराम । बेफ़िक्री कोई चिंता नहीं। मुझे तो कपड़े धोने हैं सफ़ाई , बर्तन फिर नाश्ता, दोपहर का खाना शाम की चाय फिर रात का खाना और आख़िर मे बर्तन धो रसोई साफ कर सबको दूध देना तब कहीं जाकर यात्रा का पड़ाव आता है।

और जब ऑफ़िस जाना होता है तब अलग ही तरह की चिंता होती है। सबका खाना। टिफ़िन दोपहर का मम्मीजी का भोजन सबकुछ करते करते कभी कभी अपनी चाय पिये बिना ही ऑफ़िस पहुँच जाती हूँ। फिर ऑफ़िस की दौड़भाग से घर लौटो तो फिर वही रसोई और मै। बीच बीच में कामवाली बाई जो कपड़े धोकर पटक गई है वो भी सम्भालने। किसी को फर्क नहीं पड़ता की मै भी थक गई होंगी एक कप चाय ही दे दें ताकि कुछ थकान मिटे पर उल्टा फ़रमाइशें शुरू हो जाती हैं और कुछ कहो तो पति देव बोल पड़ते हैं ।. अरे सारा दिन तो बच्चे अकेले रहते हैं अब थोड़ा कुछ बोल रहे हैं तो तुम झल्ला रही हो ऑफ़िस में तो नहीं करती होगी ऐसा। सोचने लगती क्या ये मुझे देखने आते हैं या दिव्य दृष्टि मिली है उन्हें अगर ऐसा है तो ये क्यूँ नहीं दिखता नौकरी भी तो इसीलिए कर रही हूँ की बच्चों को अच्छी सुविधाएँ मिल सकें पर कौन समझेगा । जैसे घर के काम तो औरत को ही करने हैं वो घर पर रहे या नौकरी करे।

ऐसी सोच बन गई है या फिर बनाई गई है बड़ी गहन चर्चा के विषय हैं ये सब ।. खैर आज के विषय में सोचते हैं।.लॉक्डाउन की वजह से काम वाली बाई भी तो नहीं आ पा रहीं हैं इसलिए ये यात्रा थोड़ी ज्यदा दुर्गम हो जाती है जो थोड़ा बहुत हाथ तो बँटा देती कम से कम .. यहाँ तो सोने का मुक़ाबला है कौन ज्यदा देर तक सोएगा।

सोचते सोचते वो धीरे धीरे बिना आहट चलकर बालकनी मे आ गई इतनी सोच के बाद उगते सूरज की चमकीली संतरी पीली मिली जुली क़िरणे उसके अतृप्त मन में नई ऊर्जा का संचार कर रहीं थी। उसने मुस्कराकर सूर्य देव को प्रणाम किया ॐ सूर्य देवोः नमः, भास्करः नमः, रविये नमः। उसने नई ऊर्जा का संचार महसूस किया और चल पड़ी अपनी यात्रा को आगे बढ़ाने।

उसका नाम गुलाब था जो अब गुल ही रह गया था उसके अस्तित्व की तरह नाम भी बदल गया था। गुल रसोईघर मे घुसी ही थी की एक एक कर सारे काम उसके मश्तिष्क में कौंधने लगे। उसने फिर सोचा ओह अच्छा हुआ मै आलस के कारण दोबारा नहीं सो गई । उसने रसोई और गैस साफ की थोड़ा पानी गर्म किया।

गुल को सुबह गर्म पानी पीने की आदत थी इसलिए सुबह सुबह वो औरों की तरह चाय नहीं पीती थी। उसने पानी का भगोना नीचे उतारा और कुकर में राजमा उबालने रख दिये.. पानी पी उसने कपड़े समेटे और छत पर ले गई । कपड़े धुलाई की मशीन छत पर ही थी सो उसने पानी चला मशीन भरने रख दी फिर नीचे आ नित्यक्रम से निपट मशीन में कपड़े डालने चली गई। इसी बीच कुकर सीटी मारना शुरू हो गया.. कपड़े धुलने छोड़ नीचे आई तो पति जोर से बोले गुल तुम्हें चैन नहीं सुबह सुबह इतना शोर चैन से सोने भी नहीं देती। गुल ने गैस धीमी कर दी रसोई का दरवाज़ा भी बंद कर दिया।

कपड़े धोते धोते सोचने लगी सच मुझे चैन कहाँ अभी कपड़े धो नीचे जाऊँगी तो सासू माँ की आवाज़ आएगी गुल नहा लिया हो तो चाय बना दे मेरी यही सोच अपने कपड़े भी साथ लाई थी कपड़े धोते धोते नहा भी लूँगी और कपड़े सुखाने डाल नीचे पहुँची तो एक ताना मिला कपड़े कहीं भागे जा रहे थे पहले मेरी चाय बना। उधर से पति सुबह से शोर मचा रखा है क्या कर रही हो ऐसा की मम्मी की चाय भी नहीं बनी। खैर मम्मी को उनकी चाय मिल गई वो चुप हो गईं.. गुल ने लहसुन छिलने लगीं उन्हें और सोचने लगी पति के अनुसार सुबह से मैने कुछ भी नहीं किया और छत से नीचे नीचे से ऊपर करते करते मेरे पाँव दुखने लगे पूरी छत को साफ करते करते कमर जवाब दे गई.. कपड़े धोते सुखाते, झाड़ू पोंछा करते करते साँसें उखड़ने लगीं और मै कर ही क्या रही थी अभी थोड़ी देर में सभी मेरे इर्द गिर्द मंडराने लगेंगे क्या बना है नाश्ता ये क्यूँ नहीं बना वो क्यूँ नहीं बना खैर गुल ने लहसुन प्याज़ अदरक सभी कुछ मिला मसाला बना टमाटर पीस राजमा को तड़का कर दिया।

इसलिए की मम्मीजी को रोज तरी वाली सब्ज़ी चाहिए और आज रविवार है तो आज राजमा बनाने थे इसलिए फटाफट ये काम निपटा प्याज़ काटे प्याज़ का आटा गूँथा आलू उबालने रखे थे वो छिले। इस बीच सभी उठ गए थे और जबतक सभी नाश्ते की टेबल पर पहुँचते गुल ने फटाफट मन्दिर में दिया जला अपना ये कार्य भी कर दिया और चल दी सूर्य को जल देने ये उसका नियम था बारिश तूफ़ान बादल कुछ भी हो वो सूर्य को जल देना नहीं भूलती थी।

नीचे आ उसने चाय रखी गाय की रोटी बना शुरू हो गया सबकी पसंद का नाश्ता बेटा बेटी पति मम्मीजी सभी नाश्ता करने लगे बारी बारी बर्तन भी इकट्ठे होने लगे गुल ने अपना भी नाश्ता बना दिया आसपास सफ़ाई कर अपनी चाय रख दी और समय बचाने के लिए फटाफट बर्तन माँझने लगी। अपनी चाय नाश्ता ले अभी खाने जा ही रही थी पति की आवाज़ आई गुल ग्यारह बजे मेरी कॉफ़ी बना देना उसने घड़ी की तरफ देखा दस ही मिनट थे ग्यारह बजने मे उसने नाश्ता ढक दिया दूध गैस पर रखा और लगी कॉफ़ी फेंटने ठीक ग्यारह बजे साहब को  कॉफ़ी दे अपना नाश्ता करने लगी। अरे अभी तक नाश्ता नहीं किया गुल भई कोई समय रखो खाने का फिर कहती रहती हो सर दर्द ये दर्द वो दर्द। पति कहे जा रहे थे गुल अपना नाश्ता निपटा रही थी हाँ निपटाना ही कहेंगे इसे खाना तो शान्ति से होता है..

साथ ही गुल सोच रही थी आज कुछ समय अपने लेखन के लिए निकलूँगी। इस लॉक्डाउन मे कितने ही ऑनलाइन कवि सम्मेलन, पत्र लेखन इत्यादि हुए पर मुझे समय नहीं मिला अबके कहानी लेखन में जरूर भाग लूँगी।गुल और जल्दी काम करने लगी रसोई सम्भाल बर्तन धो वो अपना मोबाइल ले बैठ गई कहानी लिखने कुछ कुछ लिखी थी आज पूरी कर पोस्ट करने की ठान ली थी उसने। अभी कुछ देर ही हुई की बच्चों की फ़रमाइश मम्मी तरबूज़ काट दो ठीक है काटती हूँ । उधर से पति अरे सुन लो कुछ समय बच्चों को भी दिया करो। सारा दिन जाने मोबाइल पर क्या करती रहती है।गुल बेमन उठी झल्लाहट थी चेहरे पर । इस आदमी को सुबह से काम नहीं दिखे।

अपनी माँ की फ़रमाइशें बच्चों की फ़रमाइशें कुछ नहीं दिखीं सिर दस मिनट के लिए मेरा फोन उठाना ही याद रहा। गुल ने तरबूज़ काट सबको दिया और फिर रसोई पुकारने लगी सब्ज़ी चावल, सलाद रायता सब होना चाहिए इसलिए अभी से लगना पड़ेगा ख़ाली राजमा से काम कहाँ होने वाला था।

 काम करते करते गुल सोच रही थी शादी होकर जब इस घर आयी थी उसके खूब सपने थे ससुराल को ले पर थोड़े दिन में ही लगा की । खैर छोड़ो ऑफ़िस जा कुछ देर बहुत सुकून मिलता था उन दिनो। गुल बहुत सुघड़ ग्रहणी तो थी ही ऑफ़िस के काम वहाँ के सांस्कृतिक कार्यों वहाँ के सभी कार्यों में भी पूर्ण निपुण थी इसलिए ऑफ़िस में भी गुल की व्यस्तता बहुत रहती थी। कार्य निपुणता कभी कभी आपको महँगी पड़ती है और आपको सामान्य व्यक्तियों से ज्यदा काम करना पड़ता है। वही गुल के साथ भी होता रहता था अक्सर। ऑफ़िस में किसी के पास काम हो ना हो गुल की टेबल हमेशा काम से भरी होती है। हँसमुख स्वभाव उसके गुलाब नाम को चरितार्थ करता था । ना कहना उसे नहीं आता था। जो भी काम देता हँस कर पूरा कर देती.. यही वजह थी की ऑफ़िस में वो हमेशा व्यस्त रहती किसी भी तरह की गॉसिप या चुग़लियों में शामिल नहीं होती थी इसीलिए शायद उसकी एक अच्छी छवि थी ऑफ़िस में।

 घर पर तो सभी राह देखते की गुल आएगी तो चाय खाना बर्तन सभी काम करेगी जैसे उसे कई हाथ मिले हों। थकी हारी गुल फिर लग जाती काम पर। छुट्टियों में ननदें आतीं तो वो भी इन्तज़ार करती अपने बच्चों के साथ गुल आकार काम करेगी और आते ही भाभी देर क्यूँ हो गई खाना कब बनेगा बच्चे कब से इन्तज़ार कर रहे हैं इत्यादि सवालों की झड़ी लग जाती मम्मीजी का तो बस एक ही काम सरकारी नौकरी में कौन काम करता है ख़ाली बैठ के आ जाते हैं एक ससुरजी थे जो मुझे समझते थे अक्सर कहते चाहे ऑफ़िस में ख़ाली बैठो थकान तो होती ही है सारे दिन की जिसे ससूजी ने कभी सुना ही नहीं पर ससुरजी हमेशा हर जगह मेरी समझदारी की बात करते मेरी तारीफ़ करते ना थकते आख़िर एक बारी में ही उन्होंने ही मुझे अपने बेटे के लिए चुना था और उनकी आशाओं पर खरी भी उतरी थी।

मैं जब तक ज़िंदा थे हर सुख दुःख उनसे ही बाँटती थी मै। मेरी पीड़ा खूब समझते थे और मुझे अपनी बेटियों से भी ज्यदा प्यार करते थे तभी तो जब घर पर कई बार पच्चीस पच्चीस लोगों का खाना बनाना पड़ता था तो कह देते थे कभी बाहर से कुछ मंगा लो वो भी इनसान है तो मम्मीजी झट से बोलतीं सब मिलकर कर रहे हैं वो क्या कर रही है। मिलकर करना यानी पूरी तलने में हाथ लगाना । आज भी याद करती हूँ तो मन में एक कड़वाहट उतर आती है हालाँकि आज सभी गुल से प्रभावित हैं उसकी सघड़ता और बुद्धिमत्ता की दाद देती हैं पर गुल उस कड़वाहट को भूल नहीं पाती । जो समय लोग कहते हैं शादी का सुनहरा समय होता है वो उसने ताने सुन सुन गुज़ारा था कैसे भूल जाती।

दिन बीतने के साथ उसे माँ बनने की आहट सुनाई दी थी बहुत खुश थी वो उस दिन पति को बताया वो भी फूले ना समाए और मम्मीजी तक खबर पहुँची उन्होंने सपने बुनने शुरू कर दिये पोता ही होगा। उनकी ज़ुबान की तल्ख़ी थोड़ा नरमी में बदली थी। बार बार के ताने की कुछ नहीं दिया मेरे मयिके वालों ने थोड़ा कम होना शुरू हुए हालाँकि ससुरजी ने एक ही बेटा है कह कर कुछ भी देने से मना किया था फिर भी माता पिता भाई सभी ने कोई कसर ना छोड़ी थी उसपर मेरी सरकारी नौकरी फिर भी यदा कदा ताने गुल के कानो को बींधते रहते थे । चलो नए मेहमान के आने की खबर से कुछ बदलाव आ रहे थे गुल की ज़िंदगी में और वो भी सभी कड़वाहटें भूल अपनी दुनिया में गुम हो गई थी।

पर कहते हैं ना जिसको सुख ना हो वो फिर कैसे सुखी रह सकता है मयिके में सबसे बड़ी बेटी होने के कारण हमेशा काम ही करती रही बचपन क्या होता है देखा ही नहीं और बड़े होते होते कई जिम्मदारियों को अपना साथी बना लिया मध्यम वर्ग परिवार की यही त्रासदी है।

शादी हुई तो एकलौति बहु सारी जीमेदारियाँ फिर गुल के कंधों पर ।अब माँ बनने का सपना जो हर औरत देखती है और अपने आप को पूर्ण तभी मानती है जब माँ बन जाती है और इस सपने के सजीव होने पर गुल फूली नहीं समा रही थी उसी ने उसको आज तोड़ कर रख दिया । दिन रात काम करने की वजह से बहुत बोझ और थकान से बच्चा गिर गया और साथ ही गुल के रंगीन सपने रंगहीन हो गए। इतना दर्द उसे अन्दर तक मार गया मम्मीजी के तानो ने उसके ज़हन को झझकोर दिया..गुल ने ईश्वर से शिकायत की क्यूँ भगवान अगर देना नहीं था तो दिया क्यूँ। मम्मीजी कहे जा रहीं थी कुछ खिला पिलाकर भी नहीं भेजा लड़की को एक बच्चा भी नहीं रख पाई कोख में।

पति थोड़ा नर्म हुए थे और उन्होंने मम्मीजी को चुप कराया। बिना खाए पिए पड़ी थी .. माँ आयी मुझे देखने और रो पड़ी कुछ दिन ले गईं अपने साथ। कुछ समय बाद ईश्वर ने फिर मुझे सौभाग्य दिया माँ बनने का फिर वही काम मम्मीजी का कहना हमने भी इतने बच्चों को जन्म दिया है आजकल की लड़कियाँ वैग्रह। और फिर वही नतीजा इस बार गुल जीवन को ख़तरे की धमकी मिल गई डॉक्टर से पति भी कुछ डर गए। और कुछ समय बाद फिर जब सौभाग्य प्राप्त हुआ तो उन्होंने साफ कह दिया की मै हल्का फुलका काम ही करूँगी शायद पिता बनने का मोह पति को भी था और इस तरह एक बेटा कुछ समय बाद एक बेटी गुल की झोली में आए उसे भी मातृत्व का सुख मिला। सास जिनको पोते की ही कामना थी उन्होंने भी खुशी ज़ाहिर की । पर दूसरी बार बेटी होने पर तानो की बौछार की सोचा था पोतों की जोड़ी बन जाएगी पर इसकी तो बेटी हुई है बड़ा शौक़ था इसे बेटी का तो बेटी ही होनी थी।

आदि आदि पर गुल बच्चों के सुख में सब भूल कर अपनी दुनिया में गुम हो गई आज बच्चे बड़े हो गए कॉलेज स्कूल वाले हो गए। ससुरजी नहीं रहे सासू माँ आज भी ताने देती हैं पर अब ये ताने चुभते नहीं गुल को।

अरे गुल आज खाना मिलेगा या नहीं पति की आवाज़ ने उसे अतीत से वर्तमान में ला दिया और उसने मशीन की तरह पहले मम्मीजी का फिर सबका खाना लगा दिया। गुल के हाथों में जादू था तभी तो वो चित्रकार भी बहुत अच्छी थी और लेखिका भी । फ़िलहाल इस लॉक्डाउन में माँ बहु पत्नी के साथ साथ काम वाली बाई कहें या फिर फ़्री की रामू थी। सभी खाना खा रहे थे गुल को भूख नहीं थी किसी ने पूछा भी नहीं क्यूँ नहीं खा रही। वो चुपचाप रसोई का काम ख़त्म करने लगी सबके खाने के बर्तन सबकुछ समेट कर उसने राहत की साँस ली पर याद आया छत से कपड़े लाने हैं वो सोचने लगी बाई का ये तो आराम था कपड़े बर्तन सफ़ाई से निजात थी पर तब ऑफ़िस का दबाव भी होता था कुल मिलाकर काम उतना ही करना है। यात्रा जारी रहनी चाहिए। 

गुल ने पति से कहा मै छत से कपड़े ले आती हूँ आप बाज़ार से दूध और कुछ जरुरत का सामान ले आओ उन्होंने कहा अब क्या काम है तुम्हारे पास जाकर ले आना घूमना भी हो जाएगा तुम्हारा वैसे भी तुम्हें बहुत शौक़ है घूमने फिरने का। गुल सोच रही थी नहीं करना था तो ये बात बिना ताने के भी हो सकती थी।

गुल छत से कपड़े लायी उन्हें तह किया और निकल पड़ी बाज़ार सोचने लगी ससुर जी थे तो बाहर के काम मै कर लूँगा कह मेरा बोझ हल्का कर देते थे पर अब सभी कुछ खुद करना होता है कभी ऑफ़िस से आते हुए सब्ज़ी लाना या फिर बच्चों का समान। कभी थकान से मन नहीं भी होता था तो भी करना पड़ता है।

ससुरजी जिन्हें गुल डैडी जी बुलाती थी आज गुल को उनकी बहुत याद आ रही थी अनायास ही आँखें झलक गईं उनके जाने के बाद किसी ने समझा ही नहीं की मुझे भी थकान होती है मुझे भी आराम चाहिए मुझे भी दुखता है ..डैडी जी सब समझते थे और सबको नियंत्रण में रखते थे सच में उन्होंने मुझे अपनी बेटीयों से ज्यदा प्यार दिया। गुल ने उन्हें मन ही मन प्रणाम किया और सभी समान ले घर पहुँची।

सब सामान धो कर अपनी अपनी जगह रख दिया आजकल कारोना महामारी के चलते बाहर से आने वाला सारा समान धोना पड़ रहा है। बाहर जाते वक्त मास्क भी पहनना पढ़ता है आकार खुद भी साबुन से हाथ पाँव धोने पड़ रहे हैं..और कपड़े भी बदलने पड़ रहे हैं सभी नियम अपना अभी बैठने जा रही थी गुल की मम्मीजी की चाय की आवाज़ आने लगी वो चाय बनाने लगी साथ ही सोचने लगी आज भी कहानी पूरी नहीं होगी आज भी मै नहीं भेज पाऊँगी.. चाय के उबाल के साथ साथ गुल का दिल और दिमाग़ उबाल खाने लगा छब्बीस दिन हो गए लॉक्डाउन हुए और मै अपने लिये इतना समय नहीं निकाल सकी एक कहानी लिख सकूँ। इस यात्रा से कुछ देर विश्राम ले सकूँ।

उसने सोचा सब अपनी मन की कर रहे हैं बच्चे, पति, मम्मीजी,आराम से सो कर उठते है, खाना टीवी और कम्प्यूटर में व्यस्त रहते हैं। अपनी पसन्द के काम करते हैं। मै ही सारा दिन सबके पसंद के काम, घर के सारे काम करते करते थक जाती हूँ इस अनंत यात्रा से। उसने मन में एक प्रण किया।

मम्मीजी को चाय दे वो बैठ गई की आज तो कहानी लिख कर ही रहेगी। विचारों का प्रवाह आता जाता रहा वो कल्पना और हक़ीक़त में गोते खाने लगी.. उसकी कलम ने रफ़्तार पकड़ ली थी और विचारों ने अपनी उड़ान भरनी शुरू कर दी थी की पति की आवाज़ आई आज रात का खाना नहीं मिलेगा.. अबकि बार गुल घबराकर उठी नहीं थी बल्कि बैठे बैठे उसने कहा आज आप कुछ बना दो। मै थक गई हूँ। उसकी आवाज़ की कर्कशता सुन पति अब नहीं बोले की फ़ोन में क्या कर रही हो चुपचाप रसोईघर की तरफ चल दिये और गुल अपनी कहानी में व्यस्त सोचने लगी । थक गई थी चलते चलते आज विश्राम का वक्त मिल ही गया।आज इस निरन्तर यात्रा का पड़ाव आ ही गया। आज मेरी कहानी पूरी हो ही गई।


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