वो साया मेरे साथ चलता है
वो साया मेरे साथ चलता है
सुलोचना को इन दिनों बिल्कुल नींद नहीं आती थी। वह बहुत परेशान रहती थी। कई दिनों से उसे मन में लगता था कि वह जब अकेली रहती है तो कोई ना कोई है जो उसके साथ रहता है।
इन दिनों ऐसा ही चल रहा था कि जब भी वह अपनी सहेली मीनाक्षी से मिलती तो दोनों सहेलियों को घोस्ट स्टोरी सुनने और देखने में बड़ा मजा आता था। दोनों बड़े मजे में भूतों की स्टोरी सुनी भी लेती थी। और कभी साथ साथ में फिल्म भी देख लेती थी। लेकिन सुलोचना के पति विवेक ज्यादातर टूर पर रहते थे और अकेले में वह कभी-कभी डर जाया करती थी।
दोनों ने अपनी-अपनी कहानियां सुनी और अपने कॉलेज के समय के कुछ ऐसी कहानियां मीनाक्षी ने सुलोचना को बताई कि उस वक्त सुलोचना को बहुत मजा आया लेकिन घर आकर उसे जरा सी आहट पर वह डर जाती थी उसे बार-बार लगता था कि कोई है जो उसके आसपास है ।
सोते जब सुलोचना की नींद खुल गई तो उसे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ और उसने सोचा कि घर के अंदर रहने से अच्छा है घर के बाहर निकल जाए घर के बाहर निकल कर बस मीनाक्षी के घर की तरफ जाने लगी और बार-बार पीछे मुड़ कर देख रही थी क्योंकि उसे लग रहा था कि उसका पीछा कर रहा है।
इतनी रात को सुलोचना को अपने घर में आया हुआ देखकर मीनाक्षी चौंक गई।।
और ....जब सुलोचना के पीछे खड़े उस व्यक्ति को देखा तब उस पर जोर से हंसने लगी।
सुलोचना के पीछे उसका पति विवेक खड़ा था । और थोड़ी देर के बाद सारी बातें साफ हुई कि विवेक जब आया तो देखा सुलोचना घर से निकलकर बिना कुछ बोले जा रही है, तो उसके पीछे पीछे आ गया ।
विवेक से पूरी बात जानने के बाद मीनाक्षी को विवेक को यह बात बता देना जरूरी लगा कि शादी के समय सुलोचना के घरवालों ने शायद विवेक को यह बात नहीं बताई थी कि, सुलोचना को नींद में चलने की बीमारी है। और कभी-कभी उससे , भी होता है कि उसके आसपास कोई है या कोई उसके साथ चल रहा है। और यह एक तरह से मानसिक बीमारी है जिसका इलाज चल रहा था और सुलोचना दवाई भी खा रही थी।
लेकिन विवेक को नहीं पता था।
आज मीनाक्षी नहीं जब विवेक को बताया तो विवेक जरा भी नाराज नहीं हुआ ।
और उसने कहा कि ...
"हमारे देश में शादी में झूठ इसलिए बोला जाता है ताकि असलियत जान लेने के बाद लड़केवाले इंकार ना कर दें। लेकिन अब सुलोचना मेरी पत्नी है और मैं इसका इलाज कराऊंगा!"
कुछ समय के लिए आज के बाद सुलोचना बिल्कुल ठीक हो गई और उन दोनों ने मीनाक्षी को धन्यवाद दिया और मीनाक्षी ने सुलोचना को इस बात के लिए कांग्रेचुलेट किया कि उसे कितना अच्छा पति मिला है जो उसे समझता है और जिसने उसे दिल से अपनाया है और उसकी बीमारी को बीमारी समझकर इलाज कराया । उसे उसने पागल नहीं कहा और ना ही उस पर हंसा।
सही मायने में विवेक सुलोचना को बहुत प्यार करता था तभी उसकी कमजोरी को उसकी बीमारी को उसने सीरियसली लिया और बजाय इसके की सास ससुर से लड़ाई करे और मीनाक्षी को बराबर भला बुरा कहे।
बजाए इसके उसने अपनी पत्नी की बीमारी को को भी सीरियसली लिया।
और अब...
इलाज के बाद दोनों पति पत्नी में और भी ज्यादा प्यार हो गया था ।
सुलोचना सच में अपने आप को धन्य समझती थी जो उसे विवेक जैसा पति पाकर मिला। जिसने उसकी बीमारी में भी उसका साथ नहीं छोड़ा और आज वह एक सामान्य जीवन जी रही थी।
(समाप्त)
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