निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Tragedy


4.7  

निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Tragedy


वो आखिरी खत..!

वो आखिरी खत..!

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दिनांक 11.06.1965


भारत-पाक सीमा युद्ध प्रगति पर


"प्रिय आशु,

मैं कुछ कहूँ इससे पहले आज तुम्हारे वापस बॉर्डर जाते वक़्त, मेरे द्वारा दिखाए गए अधीरपन और बचकानी हरकत के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। एक अर्धांगिनी होने के नाते मेरा ये कर्तव्य बनता था कि मैं तुम्हारी जिम्मेदारियों को समझूँ और इस बात को समझूँ कि तुम्हारे लिए परिवार की प्राथमिकता के साथ, देश और मां भारती की सेवा भी उतनी ही महत्ता रखती है।

आज जब तुम बॉर्डर पर वापसी के बुलावे के बाद जाने के लिए तैयार हो रहे थे और मैं मुंह फुला कर बैठ गयी, निश्चित ही मेरी बचकानी हरकत थी। एक सैनिक के लिए उसका देश, उसका कर्तव्य पहली प्राथमिकता होती है, ये शायद भूल गयी और अनजाने में ये कह डाला कि "अगर इतनी जल्दी वापस जाना ही होता है तो आते ही क्यों हो? मैं सच में स्वार्थहित में अर्धांगिनी होने का अर्थ भूल गयी थी आशु ..!

मैं एक बहादुर कैप्टेन की पत्नी होने का परिचय न दे पाई और प्रेम मोह में आकर तुम्हे भी उन बेड़ियों में जकड़ने की कोशिश में लगी थी। तुम्हारे लिए एक आदर्श जीवन संगिनी न बन पाई मैं, किन्तु आशा करती हूँ तुम मेरी भावनाएँ समझ कर और ये जानकर कि मेरा उद्देश्य तुम्हे अपने कर्तव्य पथ से दिग्भ्रमित करना नहीं अपितु तुम्हारे प्रेम और स्नेह के दो पल चुराना था, तुम आज की इस घटना के लिए मुझे, अपनी 'नादान प्रिया' को माफ कर दोगे !

आज तुम्हारे जाने के पश्चात तुम्हारी तन्हाई ने मुझे ये एहसास दिलाया कि मैं गलत थी और चूंकि अनजाने में तुम्हें अच्छी तरह विदा भी न कर सकी तो अपने एहसासों को इन शब्दों में पिरो रही हूँ। इस खत के साथ अपना समस्त प्यार इस आस में उड़ेल रही हूँ कि तुम अपनी इस नादान जीवन संगिनी को माफ कर दोगे।"

क्षमा प्रार्थी और तुम्हारी बाट जोहती-

तुम्हारी नादान 'प्रिया'


दिनांक 12.06.1965


"पाकिस्तानी घुसपैठियों के साथ मुठभेड़ में कैप्टेन आशुतोष खन्ना शहीद, अकेले नेस्तनाबूद किया एक पाकिस्तानी बंकर " 


दिनांक 14.06.1965


कैप्टेन आशुतोष का पार्थिव शरीर पूरे शासकीय सम्मान के साथ उनके गृहनगर कानपुर लाया गया, आज दी जाएगी अंतिम श्रद्धांजलि। 

कैप्टेन आशुतोष को सशस्त्र सम्मान के साथ दी गयी अंतिम विदाई, पत्नी प्रिया संग परिवार शोक संतप्त किन्तु कहा "हमें फक्र है उनकी वीरता पर !"


प्रिया नम आँखों से आशुतोष के उन आखिरी निशानों को देख रही थी जो फौज वाले उसके सामान के साथ छोड़ गए थे, उसका कड़ा, उसकी अंगूठी, और उसकी वो डायरी जिसमें वो अपनी पसंदीदा ग़ज़लें नोट किया करता था। 


अरे ये क्या, कुछ खत सा लगता है।


दिनांक 11.06.1965

"मेरी भोली "प्रिया",

आज तुम्हारा मुझसे यूँ रूठ जाना क्योंकि मैं फिर एक बार इतनी जल्दी तुम्हे अकेला छोड़ बॉर्डर पर चला आया, अभी घर आये 4 दिन भी नहीं हुए थे कि बटालियन का बुलावा आने पर मैं तुम्हें यूँ अकेला छोड़ चला आया, तुम ठीक ही कहती थी मेरी फ़र्ज़ तुम्हारी सौतन की तरह है और में बिल्कुल भी एक अच्छा पति बनने के काबिल नहीं। लोग अपनी पत्नी/प्रेयसी के लिए आसमान से तारे तक तोड़ लाते हैं, और मैं नासमझ तुम्हे प्रणय के दो क्षण नहीं दे पाता। क्या करूँ, कर्तव्य आड़े आ जाता है और चाह कर भी तुम्हारे प्रति अपने अनन्य प्यार को मैं दर्शा नहीं पाता।

आज तुम्हारा गुस्सा मुझे बिल्कुल भी अखरा नहीं, बल्कि बिल्कुल जायज था। कभी तो तुम्हें भी तुम्हारे हिस्से का वो प्यार मिलना ही चाहिए। अतः मैं एक बार फिर से आदर्श पति न बन पाने हेतु क्षमा चाहता हूँ और वादा करता हूँ, जंग खत्म होते ही लंबी छुटियाँ लेकर तुम्हारे पास दौड़ा चला आऊंगा।"

तुम्हारा और हर जन्म में सिर्फ तुम्हारा 

आशु


प्रिया की आँखें आँसुओं से सुर्ख लाल थी, दो आखिरी खत जो लिखे गए, लेकिन कभी भेजे नहीं गए, मानों एक दूसरे को कोस रहे हों।

नियति इतनी कठोर परीक्षा कैसे ले सकती है।


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