निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Inspirational


5.0  

निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

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विजय का रहस्य

विजय का रहस्य

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राजा वीरसेन व उनकी चतुरंगिणी सेना के लिए आज विशेष दिन था, पड़ोसी राज्य मालवा जो कि आकार में उनके राज्य वीरपुर से काफी वृहद था किन्तु आज उनकी पराक्रमी सेना ने मालवा की विशालकाय सेना के दांत खट्टे कर उन पर शानदार विजय प्राप्त की थी।

पूरे राज्य में जश्न का माहौल था, विजय का श्रेय राज्य की सेना के पराक्रमी घुड़सवार दल, जिनका नेतृत्व सेनापति सुंदर सिंह कर रहे थे तथा अद्भुत एवं अचूक वीरों से सुसज्जित उनके धनुर्धारी दल को जाता था जिसका नेतृत्व सेनापति विक्रमजीत के पास था।

दोनों ही वीर अपनी सेना के साथ छाती चौड़ी किये हुए राज्य के मुख्य प्रवेश द्वार पर आ पहुंचे जहां महाराजा वीरसेन द्वारा एक भव्य विजय समारोह का आयोजन किया गया था। महाराज को अपना प्रणाम पहुँचाते हुए दोनों ही सेनापतियों ने अपने- अपने दल की वीरता का वर्णन महाराज के सामने प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया।

सुंदर सिंह के अनुसार विजय का सम्पूर्ण श्रेय राज्य के बहादुर घुड़सवार दल को जाता है जिन्होंने समर में शत्रु सेना के छक्के छुड़ा दिए,वहीं दूसरी ओर ये गौरवशाली विजय धनुर्धारियों के अचूक लक्ष्य व पराक्रम के बगैर असंभव थी ऐसा सेनापति विक्रमजीत का मत था। धीरे धीरे इस चर्चा ने विवाद का स्वरूप पकड़ लिया, कोई भी दल अपने आप को तनिक भी उन्नीस मानने को तैयार नहीं था और जीत का श्रेय दोनों दल स्वयं को दिए जा रहे थे। पैदल सिपाहियों और हाथियों के दलों ने भी एक-एक दल के समर्थन का निर्णय ले लिया। अब एक तरफ सुंदर सिंह जी के नेतृत्व वाली घुडसवारों और पैदल सैनिकों का दल था तो दूसरी ओर धनुर्धारियों और हाथी सैन्य बल से सुसज्जित विक्रमजीत का नेतृत्व !

देखते ही देखते दोनों दलों में स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ लग गयी। महाराजा वीरसेन अचंभित थे, उन्होंने जैसे तैसे दोनों दलों को समझाया और आपसी मतभेद भुला विजय के जश्न में शरीक होने का सुझाव दिया।

अभी विजयोत्सव को दो दिन भी नहीं हुए थे कि अचानक खबर आयी पड़ोसी राज्य 'वसुधा' जो कि वीरपुर का मित्र राज्य हुआ करता था, उसने वीरपुर पर आक्रमण कर दिया था। सभी अचंभित थे इस अनहोनी से और इस हमले के लिए तैयार भी नही थे। 

महाराज वीरसेन ने आपातकालीन सभा बुलाते हुए सेनापति सुंदर सिंह की टुकड़ी को निर्देश दिया कि वे इस आक्रमण का सामना अपने दल के साथ करें व शत्रु का मर्दन करें। सेनापति विक्रमजीत महाराज की इस पहल से थोड़ा असन्तुष्ट प्रतीत हुए क्योंकि अवसर सेनापति सुंदर सिंह के दल को मिला था। 

सेनापति सुंदर सीना ताने अपनी टुकड़ी के साथ शत्रु की सेना का प्रतिकार करने रवाना हो गए, किन्तु उन्होंने और उनकी सेना ने शत्रु को कम कर आँका,फलतः उनकी सेना को पराजय का स्वाद चखना पड़ा, सेनापति सुंदर बंदी बना लिए गए।

ये समाचार सुनकर जहां महाराज चिंतित मुद्रा में दिखाई पड़े, सेनापति विक्रमजीत कुटिल मुस्कान के साथ बोल पड़े -" महाराज ! मैंने तो पहले ही कहा था, शत्रु मर्दन सुंदर सिंह के दल के वश की बात नहीं, एक बार हमारे दल को समर भूमि में जाने की आज्ञा दें, यदि शत्रु का समूल विनाश ना कर दिया तो कहिये।"

महाराज को सेनापति का बड़बोलापन उचित न लगा किन्तु फिर भी उन्होंने सेनापति की टुकड़ी को रणभूमि में जाने की आज्ञा दे दी। सुंदर सिंह की भांति सेनापति विक्रमजीत की अतिउत्साहित सेना भी पराजित हुई और विक्रमजीत भी शत्रु के बंदी बन गए।

दोनों बंदी सेनापतियों का शर्म से झुका सिर उनकी मनोदशा व्यक्त कर रहा था, उन्हें बंदी बनाकर शत्रु राजा के समक्ष लाया गया। शत्रु राजा दोनों सेनापतियों और उनके चतुरंगिणी सेना टुकड़ियों के पराक्रम पर एक प्रश्नचिन्ह लगा चुके थे ! अचानक महाराज वीरसेन सामने प्रकट हुए, दोनों सेनापतियों के चेहरे पर एक विस्मय भाव था वहीं महाराज के चहरे पर एक मुस्कान ! 

आखिरकार महाराज ने रहस्य खोलते हुए कहा कि वीरपुर की चतुरंगिणी सेना तभी तक अजेय है जब तक महावीर सुंदर सिंह और महापराक्रमी विक्रमजीत एक और एक नहीं बल्कि ग्यारह हैं।

दोनों सेनाएं अलग अलग निशक्त हैं किन्तु यदि मिलकर एक हो जाएं तभी अपराजेय होती हैं। किसी भी सेना में समस्त दलों का एकमत होना ही विजय सुनिश्चित करता है।

महाराज ने मित्र राज्य वसुधा के राजा के साथ मिलकर ये योजना रची थी ताकि मतभेद के विवादों में उलझे दो वीरों को एकता की महत्ता की पहचान करा सकें।

दोनों सेनापतियों को अब विदित हो चुका था की संगठन की वास्तविक शक्ति है, "एक और एक ग्यारह !"


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